जमशेदपुर : जमशेदपुर के लेखक व कवि वरुण कुमार ने महावीर चक्र विजेता जसवंत सिंह रावत के बलिदान दिवस पर विशेष व्याख्या की है. उन्होने बताया है कि भारतीय सैन्य इतिहास में कुछ ऐसे वीर योद्धाओं के नाम दर्ज हैं, जिनका जीवन और बलिदान केवल इतिहास का हिस्सा नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बन जाता है. राइफलमैन जसवंत सिंह रावत ऐसे ही अमर वीरों में से एक हैं. 4 गढ़वाल राइफल्स के इस अदम्य सैनिक ने वर्ष 1962 के भारत-चीन युद्ध में जिस साहस, धैर्य और अद्वितीय युद्ध कौशल का परिचय दिया, वह भारतीय सैन्य परंपरा में हमेशा स्मरणीय रहेगा. उनके असाधारण शौर्य की गाथा पर आधारित फिल्म ‘72 घंटे: शहीद जो कभी मरा नहीं’ ने भी उनकी वीरता को व्यापक जनमानस तक पहुंचाया. 19 अगस्त को उनके बलिदान दिवस पर पूरा देश और विशेष रूप से भारतीय सेना उनके अदम्य साहस को नमन करती है. जसवंत सिंह रावत की कहानी केवल एक सैनिक की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस संकल्प की कहानी है जिसमें कर्तव्य के सामने जीवन का कोई मूल्य नहीं रह जाता. (नीचे भी पढ़ें)
1962 का भारत-चीन युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास की कठिन परिस्थितियों में लड़ा गया था. सीमित संसाधनों, अत्यंत कठिन भौगोलिक परिस्थितियों और विषम मौसम के बावजूद भारतीय सैनिकों ने अनेक मोर्चों पर अद्भुत वीरता का प्रदर्शन किया. तत्कालीन नेफा क्षेत्र, जिसे आज अरुणाचल प्रदेश के नाम से जाना जाता है, में भी भारतीय सैनिकों ने चीनी सेना का मुकाबला किया. जसवंत सिंह रावत की तैनाती नूरानांग क्षेत्र में थी. लगभग 10 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित यह इलाका दुर्गम पहाड़ियों, बर्फीली हवाओं और कठिन रास्तों के कारण बेहद चुनौतीपूर्ण था. ऐसे वातावरण में सैनिकों के लिए लंबे समय तक मोर्चे पर टिके रहना ही अपने आप में बड़ी चुनौती थी. कहा जाता है कि जब पीछे हटने के आदेश मिले, तब भी जसवंत सिंह ने अपने मोर्चे को छोड़ना स्वीकार नहीं किया. उन्होंने अंतिम सांस तक मातृभूमि की रक्षा करने का संकल्प लिया. नूरानांग की लड़ाई में जसवंत सिंह रावत के साथ लांसनायक त्रिलोक सिंह नेगी और राइफलमैन गोपाल सिंह गुसाईं ने भी अद्भुत वीरता दिखाई. चीनी सेना की एक मीडियम मशीन गन भारतीय सैनिकों के लिए गंभीर चुनौती बनी हुई थी. इस मशीन गन से लगातार गोलीबारी हो रही थी. जसवंत सिंह और उनके साथियों ने जोखिम उठाकर उस बंकर तक पहुंचने का निर्णय लिया. उन्होंने बंकर में ग्रेनेड फेंका और बाहर निकलने वाले सैनिकों पर हमला कर दिया. इसके बाद मशीन गन को अपने कब्जे में लेकर उसका मुंह चीनी सैनिकों की ओर कर दिया. इस साहसिक कार्रवाई ने दुश्मन को भारी नुकसान पहुंचाया और भारतीय मोर्चे पर तैनात सैनिकों का मनोबल बढ़ाया. इसके बाद भी चीनी सेना ने बार-बार हमला किया. जसवंत सिंह ने असाधारण दृढ़ता के साथ प्रतिरोध जारी रखा. उनकी वीरता की सबसे प्रसिद्ध कथा यही है कि उन्होंने लगभग 72 घंटे तक दुश्मन को रोके रखा. (नीचे भी पढ़ें)
जसवंत सिंह रावत के बारे में अनेक सैन्य कथाएं और लोकविश्वास प्रचलित हैं. इनमें यह भी कहा जाता है कि उन्होंने अलग-अलग स्थानों पर हथियार और सैनिकों की मौजूदगी का आभास पैदा कर चीनी सेना को लंबे समय तक भ्रमित रखा. स्थानीय लोगों की सहायता से उन्होंने अलग-अलग फायरिंग पोजीशन का उपयोग किया।सेला और नूरा नाम की दो स्थानीय युवतियों द्वारा उन्हें सहायता पहुंचाने की कहानी भी प्रचलित है. हालांकि इस गाथा के कई विवरण लोककथाओं और सैन्य स्मृतियों का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन इसमें कोई संदेह नहीं कि जसवंत सिंह ने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में अद्वितीय साहस का परिचय दिया. अंततः वे वीरगति को प्राप्त हुए. उनकी वीरता और सर्वोच्च बलिदान के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया. यह सम्मान उनके अद्वितीय शौर्य का राष्ट्रीय स्तर पर प्रमाण है.‘बाबा जसवंत’ के रूप में आज भी सम्मान है. जसवंत सिंह रावत की स्मृति भारतीय सेना में इतनी गहरी है कि आज भी उन्हें श्रद्धा से ‘बाबा जसवंत सिंह’ कहा जाता है. नूरानांग के निकट उनके नाम पर बना स्मारक सैनिकों और आम नागरिकों के लिए श्रद्धा का केंद्र है. उनसे जुड़ी कई सैन्य परंपराएं आज भी सैनिकों की आस्था और सम्मान को दर्शाती हैं. उनके स्मारक पर उनके व्यक्तिगत सामान को सुरक्षित रखने और उनकी स्मृति को जीवित रखने की परंपरा ने उन्हें सैनिकों के बीच एक अलग पहचान दी है. (नीचे भी पढ़ें)
कहा जाता है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाला भारतीय सेना का अधिकारी हो या जवान, वह बाबा जसवंत सिंह को श्रद्धांजलि देना अपना कर्तव्य समझता है. यह सम्मान केवल एक दिवंगत सैनिक के प्रति नहीं, बल्कि उस अदम्य भावना के प्रति है, जिसका प्रतिनिधित्व जसवंत सिंह करते हैं. जसवंत सिंह रावत से जुड़ी सबसे चर्चित बात यह है कि भारतीय सेना में उनकी स्मृति को आज भी जीवंत सैन्य परंपरा के रूप में सम्मान दिया जाता है. उनके नाम से जुड़े कई किस्से सैनिकों के बीच प्रचलित हैं. उनके कमरे, वर्दी, जूतों और दैनिक उपयोग की वस्तुओं को लेकर भी अनेक कथाएं सुनाई जाती हैं. इन कथाओं का एक भावनात्मक संदेश है—सैनिक की सेवा समाप्त हो सकती है, लेकिन उसका कर्तव्य और उसकी स्मृति कभी समाप्त नहीं होती. इसी कारण जसवंत सिंह रावत आज भी केवल एक ऐतिहासिक पात्र नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों के मनोबल और सैन्य गौरव के प्रतीक बने हुए हैं. उनसे जुड़ी एक अत्यंत भावुक सैन्य परंपरा का भी उल्लेख मिलता है. कहा जाता है कि उनके परिवार की ओर से यदि छुट्टी की आवश्यकता से संबंधित औपचारिक आवेदन किया जाता है, तो उनके चित्र को सैनिक सम्मान के साथ उनके पैतृक गांव ले जाया जाता है और छुट्टी पूरी होने के बाद उसी सम्मान के साथ वापस स्मारक पर लाया जाता है. यह परंपरा तथ्य से अधिक एक भावनात्मक श्रद्धांजलि के रूप में देखी जाती है. इसका संदेश स्पष्ट है कि भारतीय सेना अपने वीर सैनिकों को उनके बलिदान के बाद भी नहीं भूलती. जसवंत सिंह रावत की गाथा आज के युवाओं को कई महत्वपूर्ण संदेश देती है. पहला संदेश है—कर्तव्य के प्रति निष्ठा. दूसरा है—विपरीत परिस्थितियों में धैर्य. तीसरा है—राष्ट्र के प्रति समर्पण. जब देश की सीमाओं की सुरक्षा के लिए भारतीय सैनिक कठिनतम परिस्थितियों में तैनात रहते हैं, तब जसवंत सिंह रावत जैसे वीरों की स्मृति सैनिकों को प्रेरणा देती है. उनका जीवन बताता है कि युद्ध केवल हथियारों से नहीं जीता जाता; उसके लिए साहस, मनोबल, अनुशासन और मातृभूमि के प्रति अटूट विश्वास भी आवश्यक है. जसवंत सिंह रावत भले ही 1962 में रणभूमि में वीरगति को प्राप्त हुए, लेकिन उनकी वीरता आज भी जीवित है. उनके नाम के साथ जुड़ी ‘बाबा’ की श्रद्धा, नूरानांग का स्मारक और भारतीय सैनिकों की भावनाएं उनकी अमर विरासत की गवाही देती हैं. 19 अगस्त के बलिदान दिवस पर महावीर चक्र विजेता राइफलमैन जसवंत सिंह रावत को शत-शत नमन. उनका सर्वोच्च बलिदान भारतीय सैन्य इतिहास में सदैव स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा.







