spot_imgspot_img

Global Statistics

All countries
262,429,694
Confirmed
Updated on November 30, 2021 11:38 AM
All countries
235,226,776
Recovered
Updated on November 30, 2021 11:38 AM
All countries
5,224,820
Deaths
Updated on November 30, 2021 11:38 AM
spot_img

jamshedpur-new-park-with-love-story-जमशेदपुर के लोगों को समर्पित हो गया पिता-पुत्र और पति-पत्नी के अनूठे प्रेम और समर्पण का प्रतीक ”पार्क”, देश का एक मात्र पार्क ऐसा जहां पति के साथ लगी है पत्नी की भी प्रतिमा, वह ”हीरे की अंगूठी” प्रेम और समर्पण की देगा गवाही, जिसके बिकने पर बच पायी थी जमशेदपुर की ”पहचान”, देश में ऐसा तीसरा मॉडल जमशेदपुर में, जानें इस पार्क की पूरी कहानी, देखिये कैसे बना है पार्क, एक क्लिक में देखे कैसा बना है पार्क

Advertisement
सर दोराबजी टााट और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा की फाइल फोटो.

जमशेदपुर : भारत में वैसे तो कई पार्क हुए होंगे, लेकिन जमशेदपुर में एक ऐसा पार्क बनाया गया है, जो देश में पिता और बेटे के प्रेम और समर्पण जबकि पत्नी का अपने पति के प्रति का प्रेम और समर्पण को दर्शाने वाला पार्क शायद ही रहा होगा. लेकिन यह जमशेदपुर में हो पा रहा है. जमशेदपुर के कीनन स्टेडियम के पास बनाये गये दोराबजी टाटा पार्क को नये रुप में शनिवार को आम लोगों के लिए खोल दिया गया है. हालांकि, अभी आम लोग इसमें नहीं जा सकेंगे क्योंकि झारखंड सरकार ने अब तक किसी तरह के पार्क को नहीं खोला है. इस पार्क को नये सिरे से बनाया गया है, जहां पहली बार पति के कृतियों के कारण तो पहले से ही मूर्ति लगायी गयी थी, लेकिन उनका साथ देने वाली पत्नी की भी प्रतिमा लगा दिया गया है. ऐसे पति थे टाटा संस के पूर्व चेयरमैन सर दोराबजी टाटा और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा. इन दोनों की प्रतिमा यहां लगायी गयी है. एक तरफ सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा पहले से ही था तो दूसरी ओर उनकी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा की प्रतिमा लगायी गयी है, जिसको समर्पित किया गया. यहां के प्रतिमा और पार्क के नये लुक को ऐतिहासिक आर्किटेक्ट नुरू करीम ने तैयार किया है, जिसकी देखरेख में यह पार्क बनाया है. यह पार्क ऐतिहासिक होगा, जहां एक बेटे का पिता के प्रति कर्तव्यपरायणता को याद करता है जबकि पति के प्रति पत्नी का स्नेह और समर्पण को दिखाता है. अगर लेडी मेहरबाई टाटा अपने गहने को गिरवीं नहीं रखती तो जमशेदपुर की इज्जत कही जाने वाली टाटा स्टील बच नहीं पाता, जिसके जरिये जमशेदपुर की इज्जत भी बची थी. लेडी मेहरबाई टाटा के जन्मदिन के मौके पर इसको समर्पित किया गया. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)

Advertisement
Advertisement

चाणक्य चौधरी व उनकी टीम की सोच का है यह नतीजा
टाटा स्टील के वीपी सीएस चाणक्य चौधरी एक दिन सर दोराबजी टाटा पार्क की ओर से जा रहे थे. तब उन्होंने इस पार्क को निरस की तरह देखा. इस पर उन्होंने अफसोस जताते हुए इसकी तस्वीर को अपने वाट्सएप ग्रुप में साझा की. इसके बाद उन्होंने अधिकारियों के साथ बैठक की. खुद चाणक्य चौधरी ने आयोजित समारोह के दौरान बताया कि उन्होंने इसका आइडिया आर्किटेक्ट नुरू करीम के साथ साझा की. प्लान तैयार कराया. प्लान के मुताबिक, स्ट्रक्चरा के जरिये इसके डायमंड को याद किया गया, जिसको गिरवीं रखकर सर दोराबजी टाटा ने टाटा स्टील को बचाया था. इस बीच टाटा स्टील के अधिकारी फरजान हिरजी ने आइडिया दिया कि लेडी मेहरबाई टाटा की भी प्रतिमा लगनी चाहिए, जिसके बाद यह मूर्ति स्थापित हो पायी. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)

Advertisement
पार्क का नया लुक और मनोरम दृश्य.

1995 में बना था पार्क, अब नये लुक में नजर आयेगा यह पार्क
सर दोराबजी टाटा पार्क को 16 सितंबर 1995 को समर्पित किया गया था. उस वक्त टाटा संस के निदेशक एसए सबावाला ने इसका उदघाटन किया था. दो रोज गार्डेन, तीन फाउंटेन और सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा यहां स्थापित है, जिसकी स्थापना टाटा स्टील के टाउन डिवीजन (अब जुस्को) लॉरेंस फ्रांसिस और जतिंदर सिंह ने संयुक्त रुप से बनाया था. करीब 25 साल के बाद इसको नया लुक दिया गया है. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)

Advertisement
पार्क का नया लुक और मनोरम दृश्य.

क्या है पति-पत्नी और पिता-बेटे का प्यार का इतिहास
टाटा स्टील की स्थापना का सपना जमशेदजी नसरवानजी टाटा ने देखा था, लेकिन वे इस सपने को साकार नहीं कर पाये थे क्योंकि उससे पहले ही उनकी मौत हो गयी थी. उनकी मौत के बाद उनके बड़े बेटे सर दोराबजी टाटा ने इसकी कमान संभाली और उनके ही मेहनत के बल पर 26 अगस्त 1907 को 2,31,75,000 रुपये की मूल पूंजी के साथ टाटा स्टील (पहले टिस्को नाम था) को पंजीकृत कराया और फिर 1908 में टाटा स्टील का निर्माण शुरू हुआ और आज 113 साल के बाद भी टाटा स्टील ना सिर्फ जमशेदपुर बल्कि पूरे झारखंड, बिहार और पूर्वोत्तर भारत ही नहीं बल्कि दुनिया में भारत की पहचान बन चुकी है. इस तरह सर दोराबजी टाटा ने कंपनी की स्थापना कर अपने पिता को दिये गये वादे को निभाया और बेटे के धर्म को निभाया. टाटा स्टील में एक वक्त ऐसा भी आया, जब सर दोराबजी टाटा के पास कर्मचारियों को वेतन देने का पैसा नहीं था. वर्ष 1924 में यह हालात उत्पन्न हुए थे. उस वक्त सर दोराबजी टाटा ने अपने मोती जड़ित टाइपिन और उनकी पत्नी लेडी मेहरबाइ टाटा को गिफ्ट में दिये गये जुबिली डायमंड को गिरवीं रख दिया था, जिसको इंपीरियल बैंक ने एक करोड़ रुपये उनके इन गहनों को रखने के बाद व्यक्तिगत लोन के तौर पर दिया था. इस जुबिली डायमंड के बारे में कहा जाता है कि वह डायमंड कोहिनूर के आकार से भी दोगुना था और क्वीन विक्टोरिया के साथ ऐसा गहना था और यह दुनिया का सबसे बड़ा डायमंड में से एक था, जिसको सर दोराबजी टाटा ने पेरिस से खरीदकर अपनी पत्नी लेडी मेहरबाई टाटा को गिफ्ट दिया था. एक पत्नी के तौर पर लेडी मेहरबाइ टाटा ने अपनी भूमिका निभायी थी, जिसको सर दोराबजी टाटा ने ही गिफ्ट में दिया था, लेकिन संकट के वक्त अपने सबसे महंगे और प्यारे गहने को भी गिरवीं रखने के लिए दे दी थी. इस तरह मेहरबाइ टाटा की भूमिका भी यादगार है. इसको देखते हुए वहां सर दोराबजी टाटा की प्रतिमा के साथ पहली बार उनकी पत्नी मेहरबाई टाटा की भी प्रतिमा स्थापित की गयी है जबकि लेडी मेहरबाई टाटा की प्रतिमा के साथ ही यहां एक बड़ा सा डायमंड आकार का स्ट्रक्चर (टाटा स्ट्रक्चरा की ओर से तैयार) भी तैयार किया गया है, जिसको बीचोबीच बनाया गया है. जुबिली डायमंड के सामान इसको बनाया गया है, जो स्टील का है. इसके जरिये उस वक्त लेडी मेहरबाई के उठाये गये कदम को यहां यादगार के तौर पर इसको संजोया जा रहा है. इस पार्क में एक पति के प्रति पत्नी के दायित्व, प्यार और कर्तव्यपरायणता को भी दर्शाया जा रहा है तो एक पिता के साथ किये गये वादे को सर दोराबजी टाटा द्वारा पूरा जिस तरह से किया गया था, उसको भी दर्शाया गया है. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)

Advertisement
पार्क का नया लुक और मनोरम दृश्य.

सर दोराबजी टाटा और मेहरबाई टाटा की जीवनी :
टाटा समहू के संस्थापक जमशेदजी नसरवानजी टाटा और हीराबाई टाटा के ज्येष्ठ पुत्र, सर दोराबजी टाटा का जन्म 27 अगस्त, 1859 को हुआ. उन्हानें बम्बे के प्रापेराइटरी हाई स्कलू में और फिर कैंब्रिज के कॉलेज में अध्ययन किया और उसके बाद 1882 में सेंट जेवियर्स कॉलेज, बांबे से आटर्स् में स्नातक (ग्रेजुएट) की डिग्री हासिल की. उनके पिता ने उन्हें पत्रकारिता में अपना वहृद अनुभव हासिल के लिए प्रोत्साहित किया. युवा दोराबजी ने पांडिचेरी में एक टेक्सटाइल परियोजना स्थापित की और नागपुर में
एम्प्रसे मिल का कार्यभार भी संभाला. वर्ष 1887 में रतन जी टाटा के साथ, वे नवस्थापित टाटा एंड संस के पाटर्नर में से एक बन गये. सर टाटा एक उत्साही खिलाडी़ थे आरै उन्हानें टेनिस खिलाडी़ के रूप में अपनी खास पहचान बनायी तथा कैंब्रिज में अपने कॉलेज के लिए फुटबॉल और क्रिकेट खेला. वह एक उत्कृष्ट घुड़सवार भी थे. 14 फरवरी, 1898 को दोराबजी टाटा और मेहरबाई टाटा का विवाह बांबे (अब मुंबई) में एक भव्य समारोह में संपन्न हुआ. 1910 में सर टाटा को भारत के औद्योगिक विकास में उनके योगदान के लिए ‘नाइटहडु’ की उपाधि से नवाजा गया था. इंग्लैंड में बक्रुवुड सेमिट्री, जहां उनकी पत्नी को दफनाया गया था, के दारै के सिलसिले में 3 जून, 1932 को जर्मनी में निधन हो गया. उन्हें उनकी पत्नी के कब्र के पास ही दफनाया गया. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)

Advertisement
पार्क का नया लुक और मनोरम दृश्य.

देश में ऐसा टाटा स्ट्रक्चरा ने चौथा अनूठा आकृति बनाकर तैयार की
टाटा स्ट्रक्चरा टाटा स्टील का ही प्रोडक्ट है, जिसके माध्यम से टाटा स्टील ऐतिहासिक स्ट्रक्चर को तैयार कर चुकी है. इससे पहले कोलकाता के नेताजी सुभाष चंद्र बोस एयरपोर्ट को इससे ही बनाया गया. देश के कई स्टेडियम को भी इसके जरिये ही बनाया गया. कई सारे रेलवे प्लेटफॉर्म में भी टाटा स्ट्रक्चरा का इस्तेमाल किया जा रहा है. इससे पहले टाटा स्टील द्वारा मुंबई के चर्चगेट के पास क्रॉस मैदान में 2012 में ऐतिहासिक चरखा बनाया गया है जबकि ओड़िशा के भुवनेश्वर में बिजू पटनायक पार्क में 2019 में रथ बनाया गया है.

Advertisement
[metaslider id=15963 cssclass=””]

Advertisement
Advertisement
WhatsApp Image 2020-06-13 at 7.45.22 PM
IMG-20200108-WA0007-808x566
WhatsApp Image 2020-06-13 at 7.45.22 PM (1)
WhatsApp_Image_2020-03-18_at_12.03.14_PM_1024x512
previous arrow
next arrow

Leave a Reply

spot_img

Must Read

Related Articles

Don`t copy text!