जमशेदपुर : जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज के आर्ट एंड कल्चरल सेल एवं हिन्दी विभाग की ओर से स्वामी विवेकानंद सभागार में प्राचार्य डॉ कृष्णा प्यारे की अध्यक्षता में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद की जयंती पर “प्रेमचन्द : साहित्य,समाज और समकाल” विषय पर संगोष्ठी आयोजित हुई. विषय प्रवेश हिन्दी विभाग के अध्यक्ष डॉ राजीव रंजन राकेश ने कराया. (नीचे भी पढ़ें)

मुख्य अतिथि प्रो अहमद बद्र ने कहा कि मुंशी प्रेमचंद का साहित्य भारतीय समाज के यथार्थ का जीवंत दस्तावेज है. उनकी रचनाओं में मानवीय संवेदना, सामाजिक न्याय और समानता का संदेश निहित है. प्रो बद्र ने प्रेमचंद के साहित्य की प्रासंगिकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि बदलते समय में भी मुंशी प्रेमचंद की रचनाएं पाठकों को सामाजिक सरोकारों और मानवीय मूल्यों के प्रति जागरूक करती हैं. इस दृष्टि से मुंशी प्रेमचन्द अपने समय से आगे के रचनाकार हैं. उनकी दूरदर्शिता उनकी रचनाओं से सिद्ध है. भारत को समझने के लिए मुंशी प्रेमचन्द को पढ़ना आवश्यक है. वर्तमान में भारतवर्ष व्यापक स्तर पर जिन समस्याओं से जूझ रहा है, उन समस्याओं का चित्रण प्रेमचन्द ने सौ वर्ष पहले ही अपनी रचनाओं में कर दिया था. उनकी प्रसिद्ध कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन राष्ट्रप्रेम में होने की प्रेरणा दे रही है. जिस समय प्रेमचन्द ने यह कहानी लिखी, उस समय कोई स्वतंत्रता आंदोलन नहीं चल रहा था, लेकिन इस कहानी के माध्यम से प्रेमचन्द ने समाज का, देश का भविष्य उद्घाटित कर दिया था. पारिवारिक विघटन को रोकती बड़े घर की बेटी आनन्दी सौ वर्ष पूर्व के उस समाज की स्त्री की महत्ता को उद्घाटित करती है. प्रो बद्र ने कहा कि मुंशी प्रेमचन्द समानता के साहित्यकार हैं. उनकी रचनाओं में वर्तमान की भविष्यता है. (नीचे भी पढ़ें)
मुख्य वक्ता डॉ सुभाष गुप्ता ने अपने वक्तव्य में कहा कि बदलते सामाजिक, सांस्कृतिक,पारिवारिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए मुंशी प्रेमचंद को पढ़ना जरूरी है. प्रेमचंद को याद करना उसे विचारधारा को याद करना है जो विश्व बंधुत्व, प्रेम और भाईचारे,मानवीयता,सांस्कृतिक एकता की विचारधारा है. किसी रचना या रचनाकार का मूल्यांकन उसकी प्रासंगिकता के आधार पर किया जाता है. इस दृष्टि से मुंशी प्रेमचंद सर्वकालिक हैं. विश्व बंधुत्व की भावना जो आज क्षीण होती दिखाई दे रही है, प्रेमचन्द उसके प्रतिपक्षी साहित्यकार हैं. प्रेमचन्द की रचनाओं से संदर्भ उपस्थित करते हुए भूमण्डलीकरण के इस दौर में नई आर्थिक नीतियों के आम जनमानस के जीवन पर पड़ते प्रभाव पर चर्चा की. उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचन्द ने उस राष्ट्रीयता का स्वप्न देखा था जिसमें समानता हो. (नीचे भी पढ़ें)

अध्यक्षीय संबोधन में प्राचार्य डॉ कृष्णा प्यारे ने मुंशी प्रेमचन्द के साहित्यिक योगदान की चर्चा करते हुए उनकी विशेषताओं एवं प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि मुंशी प्रेमचन्द ने समाज में व्याप्त कुरीतियों एवं रूढ़ियों पर सृजनात्मक रूप से प्रहार किया और जनमानस में जागृति फैलाने का कार्य किया. मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य तकनीकी सुविधाओं से संपन्न वर्तमान के सूचना क्रांति युग से लगभग सौ वर्ष पूर्व का साहित्य है, लेकिन वर्तमान समाज के वास्तविक स्वरूप को उद्घाटित करता है. उनके समय की समस्याएं आज भी अपना अस्तित्व जमाए हुए हैं. मुंशी प्रेमचन्द का साहित्य आदर्श जीवन का गीत है जो समाज का मार्ग प्रशस्त करता है. (नीचे भी पढ़ें)

इस अवसर पर विद्यार्थियों के लिए मुंशी प्रेमचंद के जीवन, साहित्य और उनकी कालजयी रचनाओं पर आधारित प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता भी आयोजित की गई. कार्यक्रम को सफल बनाने में जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज के आर्ट एंड कल्चरल सेल एवं हिन्दी विभाग के सभी सदस्यों, शिक्षकों, विद्यार्थियों एवं सहयोगियों का महत्वपूर्ण योगदान रहा. अवसर पर डॉ एस खान, डॉ दुर्गा तमसोय, डॉ अंशु श्रीवास्तव, डॉ पुष्पा सिंह शोभा देवी, डॉ राजू ओझा, डॉ स्वाति सोरेन, डॉ प्रकाश सरकार, डॉ श्वेता शर्मा, डॉ पुष्पा तिवारी, डॉ अनुपम सिंह, डॉ अनिता कुमारी, डॉ शालिनी शर्मा, डॉ संजय नाथ, प्रो स्वरूप कुमार मिश्रा, प्रो अमित जाना की उपस्थिति रही. छात्र छात्राओं में लक्ष्मण गोराई, आशीष चौधरी, माधुरी कुमारी, जयश्री महतो, श्रुति कुमारी, रौशनी कुजूर,रिया गुप्ता,पूजा कुमारी, अजय महाकुड़, खुशबू पोद्दार ने सक्रिय सहभागिता निभाई. कार्यक्रम का संचालन डॉ प्रियंका सिंह ने किया तथा डॉ सविता पॉल ने धन्यवाद ज्ञापन किया.



