जमशेदपुर : जमशेदपुर के सत्र न्यायालय ने इंकैब कंपनी (केबुल कंपनी के रुप में जाना जाता है) में हुए गंभीर आर्थिक घोटाले के मामले में पूर्व लिक्विडेटर शशि अग्रवाल की अग्रिम जमानत याचिका को खारिज कर दिया है. यह मामला इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड से जुड़ा है, जहां कंपनी की संपत्तियों और फंड्स में बड़े पैमाने पर हेराफेरी के आरोप हैं. न्यायाधीश वैशाली श्रीवास्तव ने अपने आदेश में कहा कि यह न केवल एक साधारण धोखाधड़ी का मामला है, बल्कि एक संगठित आर्थिक अपराध है जो देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान पहुंचाता है. इस फैसले से कंपनी के पूर्व कर्मचारियों और मजदूरों को न्याय की उम्मीद जगी है, जो वर्षों से अपने बकाया वेतन और मजदूरी की मांग कर रहे हैं.
इंकैब इंडस्ट्रीज लिमिटेड की स्थापना 1920 में ब्रिटिश इंडियन केबल कंपनी (बीआईसीसी) द्वारा जमशेदपुर में की गई थी. टाटा स्टील द्वारा दी गई करीब 15,724 एकड़ भूमि पर फैली इस कंपनी में कार्यालय, आवासीय क्वार्टर और अन्य सुविधाएं थीं. 1985 में केंद्र सरकार ने कंपनी का अधिग्रहण किया, जिसमें वित्तीय संस्थाओं की 52% हिस्सेदारी थी. हालांकि, 1993 तक कंपनी दिवालिया हो गई और मजदूरों को सितंबर 1993 से सितंबर 1996 तक वेतन नहीं मिला. इसके बाद, मॉरीशस स्थित लीडर यूनिवर्सल कंपनी ने 51.16% शेयरधारिता के साथ प्रबंधन संभाला, लेकिन 2001 में उन्होंने कंपनी छोड़ दी। कंपनी को 4 अप्रैल 2020 को बीआईएफआर द्वारा बीमार घोषित किया गया. (नीचे भी पढ़ें)
शिकायतकर्ता, जो कंपनी के सेवानिवृत्त कर्मचारी हैं, ने आरोप लगाया कि आरोपी रामेश घमंडी राम गोवानी (आरोपी नंबर 8) और उनके सहयोगियों ने कंपनी की संपत्तियों को हड़पने की साजिश रची. उन्होंने 22 सितंबर 2008 को तीन निदेशकों (आरोपी नंबर 9, 10 और 11) को नियुक्त किया, जो गोवानी के आदमी थे. आरोप है कि आईसीआईसीआई बैंक, एक्सिस बैंक और सिटी बैंक जैसी संस्थाओं ने एनपीए (नॉन-परफॉर्मिंग एसेट्स) को आर आर केबल्स, कमला मिल्स, फस्क्वा इंवेस्टमेंट, पेगासस एसेट्स रिकंस्ट्रक्शन, ट्रॉपिकल वेंचर्स और अन्य कंपनियों को हस्तांतरित किया, जिनमें से तीन गोवानी की कंपनियां थी. न्यायालय ने यह दर्ज किया कि आरोपी शशि अग्रवाल ने रमेश घमंडीराम गोवानी, पेगासस और ट्रॉपिकल आदि कंपनियों से मिलकर साज़िश के तहत इंकैब कंपनी का कुल कर्ज 21.63 करोड़ रुपये से बढ़ाकर 2000 करोड़ रुपये कर दिया जबकि दिल्ली उच्च न्यायालय 06 जनवरी 2016 को पहले ही इंकैब कंपनी की वित्तीय देनदारियों को 21.63 करोड़ घोषित कर चुकी है. (नीचे भी पढ़ें)
कोलकाता के मजदूरों ने एनसीएलटी कोलकाता में याचिका दायर की, जिसके बाद 7 अगस्त 2019 को मोरेटोरियम और 7 फरवरी 2020 को लिक्विडेशन का आदेश हुआ. एनसीएलएटी ने 4 जून 2021 को गोवानी की निदेशकीय भूमिका को अवैध घोषित किया और शशि अग्रवाल को फ्रॉडस्टर बताते हुए हटा दिया, साथ ही आईबीबीआई को उनके खिलाफ कार्रवाई के निर्देश दिए. जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 3 दिसंबर 2021 को एनसीएलएटी के आदेशों को बरकरार रखा, लेकिन आईबीबीआई को प्रतिकूल टिप्पणियों को नजरअंदाज कर शस्त्र अग्रवाल की कारगुज़ारियों की जांच करने को कहा. आईबीबीआई ने अपनी जाँच के बाद शशि अग्रवाल को जालसाज़ घोषित किया और रिज़ोल्यूशन प्रोफ़ेशनल बनने की उसकी अर्हता (रजिस्ट्रेशन) रद्द कर दी. शिकायतवाद मामला नंबर 2227/2021 में 22 आरोपी नामित हैं, जिसमें शशि अग्रवाल आरोपी नंबर 21 हैं. उन पर धारा 409 (आपराधिक विश्वासघात), 120बी (साजिश) और 34 (साझा इरादा) के तहत आरोप हैं. शिकायतकर्ता का दावा है कि अग्रवाल, जो एनसीएलटी द्वारा नियुक्त लिक्विडेटर थे, ने कंपनी की संपत्तियों की जांच करने के एनसीएलटी के आदेश को नजरअंदाज किया और गोवानी के साथ मिलकर फंड्स की हेराफेरी की. इससे मजदूरों के 300 करोड़ से अधिक बकाया वेतन प्रभावित हुए. श्री अग्रवाल की ओर से वकील तापस कुमार मित्रा ने दलील दी कि यह कंपनी एक्ट का मामला है और मजिस्ट्रेट कोर्ट को संज्ञान लेने का अधिकार नहीं. उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के आदेश का हवाला दिया कि आईबीबीआई को एनसीएलएटी की टिप्पणियों को नजरअंदाज करना चाहिए. लेकिन अभियोजन पक्ष और शिकायतकर्ता के वकील अखिलेश श्रीवास्तव और अमिताभ कुमार, ने कहा कि अग्रवाल मुख्य साजिशकर्ता हैं, जिन्होंने अपनी पेशेवर क्षमता का दुरुपयोग किया. उन्होंने एनसीएलएटी के आदेश के पैरा 85-88 का हवाला दिया, जहां अग्रवाल को निष्पक्ष न होने के लिए हटाया गया. न्यायाधीश वैशाली श्रीवास्तव ने 10 सितंबर 2025 को दिए 11 पैराग्राफ के विस्तृत आदेश में याचिका खारिज की. उन्होंने कहा कि अग्रवाल ने लिक्विडेटर के रूप में अपनी जिम्मेदारी निभाने में असफल रहे और संभवतः साजिश में शामिल होकर 21 करोड़ के कर्ज को 2009 करोड़ तक पहुंचाने में मदद की. (नीचे भी पढ़े)
अदालत ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों जैसे पी चिदंबरम बनाम ईडी (2019), वाईएस जगन मोहन रेड्डी बनाम सीबीआई (2023) और सतेंद्र कुमार अंतील बनाम सीबीआई (2022) का हवाला दिया, जहां आर्थिक अपराधों में अग्रिम जमानत को असाधारण परिस्थितियों में ही देने की बात कही गई है. अदालत ने जोर दिया कि ऐसे अपराध देश की अर्थव्यवस्था को प्रभावित करते हैं और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देते हैं. यह व्यक्तिगत अपराध नहीं, बल्कि समाज और देश के खिलाफ अपराध है, आदेश यह स्पष्ट में कहा गया. अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि मामला श्रेणी ‘ए’ अपराधों (7 वर्ष से कम सजा) में नहीं आता, बल्कि गंभीर आर्थिक धोखाधड़ी है. इस फैसले से इंकैब के पूर्व मजदूरों में उत्साह है। शिकायतकर्ता ने कहा कि एनसीएलटी ने जो आदेश देना चाहिए था, वह सत्र अदालत ने दिया. हमारी मेहनत रंग ला रही है. यह मामला दो रिजॉल्यूशन प्रोफेशनल्स (शशि अग्रवाल और पंकज तिब्रेवाल), गोवानी और अन्य कंपनियों के खिलाफ बड़े घोटाले को उजागर करता है, जो एनसीएलटी की दो पीठों द्वारा नजरअंदाज किया गया था. विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला आर्थिक अपराधों में पेशेवरों की जिम्मेदारी पर नई मिसाल कायम करेगा. मामले की जांच जारी है और अन्य आरोपियों पर भी कार्रवाई की उम्मीद है. मजदूरों के तरफ़ से अखिलेश श्रीवास्तव, अमिताभ कुमार, मंजरी सिंहा और निर्मल घोष ने बहस में हिस्सा लिया.





