जमशेदपुर : बंगला साहित्य और समाज सेवा के क्षेत्र में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी हाराधन अधिकारी का देहांत बीती रात को सारजामदा बावनगोड़ा स्थित अपने घर निद्रावस्था में हो गया. वे 75 साल के थे तथा पिछले 1 साल से बीमार चल रहे थे. ब्रेन हेमरेज होने के कारण वे पिछले 5 महीने से बेड पर थे. वे टाटा स्टील के जनस्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थे. बाद में उन्होंने साहित्य सेवा के लिए वॉलंटरी रिटायरमेंट ले लिया. उन्होंने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा, पुस्तक लेखन और समाज सेवा में लगा दिया. उन्होंने आजीवन विवाह नहीं किया. उनके कहानी और उपन्यास काफी लोकप्रिय हुये. उनकी कई कहानियों का अनुवाद हिंदी में किया गया कथा हिंदी पत्र पत्रिकाओं में उसका प्रकाशन हुआ. (नीचे भी पढ़े)
वे गरीबों और दबे कुचले लोगों की पीड़ा अपनी कहानियों में उठते थे.हाराधन अधिकारी मासिक पत्रिका “सिंहभूम वार्ता” के सह-संपादक के रूप में जुड़े रहे और ‘परसुडीह समाज कल्याण समिति’ के सक्रिय सदस्य थे. वे “पंचपल्लव” नामक कृति से भी जुड़े रहे हैं.एक समर्पित समाजसेवी के रूप में उन्होंने 1982 से लगातार समाज के अत्यंत गरीब और अनाथ परिवारों की मदद की. उन्होंने लगभग 53 गरीब और अनाथ कन्याओं के विवाह कराये, जिनमें से 4 अनाथ युवतियों का उन्होंने स्वयं कन्यादान किया. इसके अलावा, उन्होंने एक होम्योपैथी धर्मार्थ चिकित्सालय का संचालन किया और कुष्ठ रोगियों की सेवा में खुद को समर्पित रखा. स्वास्थ्य के क्षेत्र में उनका एक बड़ा योगदान यह भी था कि वे हर साल स्लम (बस्तियों) के लगभग 20 हजार बच्चों को चेचक निवारक दवा उपलब्ध कराने थे. (नीचे भी पढ़े)
सम्मान और पुरस्कार:उनके इस निस्वार्थ सेवा भाव और साहित्यिक योगदान के लिए उन्हें कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया, जिनमें प्रमुख हैं.उद्दीप्त पुरस्कार, आशापूर्णा देवी पुरस्कार,
विवेकानंद स्मृति पुरस्कार, मानव रत्न सम्मान आदि है. उन्हें एक प्रखर नाट्य व्यक्तित्व, संगठनकर्ता, प्रकृति प्रेमी, साहित्यकार और समाजसेवी के रूप में ‘उत्तरबंग नाट्यजगत् पुरस्कार’ से भी विभूषित किया गया था.नर सेवा ही नारायण सेवा है” के मूलमंत्र को अपने जीवन में उतारने वाले महान समाजसेवी, साहित्यकार और संवेदनशील व्यक्तित्व हाराधन अधिकारी समाज ने वंचितों, अनाथ बच्चियों और बीमार लोगों के कल्याण के लिए अनेक काम किये. उनके परिवार में उनके तीन भाई हैं.







