सुगम कुमार सिंह / जमशेदपुर : झारखंड एवं इससे सटे प्रदेशों के आदिवासी समुदाय का जीवन परंपरागत रूप से प्रकृति एवं प्रकृति प्रदत्त चीजों पर ही निर्भर रहा है. प्रकृति प्रदत्त वनों का दोहन ही सहस्राब्दियों पुरानी परंपरा है आदिवासियों की, किन्तु यह भी सच है कि जो वन आदिवासी समूहों के प्रभाव क्षेत्र में हैं, वहीं की वन संपदा सबसे सुरक्षित भी है. वनोपज उनके आहार का प्रमुख साधन हैं, चाहे वे वनों में उपजी साग-सब्जियां हों या वन्य पेड़ों से प्राप्त फल. इन्हीं वनोपजों को वे अनुभव सिद्ध तरीके से विभिन्न बीमारियों की दवा के रूप में भी इस्तेमाल करते हैं. वनों में उपजनेवाले कई ऐसे खर-पतवारों, फलों या वन्य जीवों का सेवन वे बिना उनका गुण-दोष जाने भी परंपरागत रूप से करते आ रहे हैं, लेकिन वे उन्हें कई बीमारियों से बचाये रखते हैं. (नीचे भी पढ़ें)

वनों से प्राप्त ऐसा ही एक जीव है देमता जो जंगल में पेड़ों पर अक्सर पाये जाते हैं. पेड़ों के पत्तों को अपनी लार से जोड़ कर अपना घोंसला बनाने वाली इन लाल चींटियों को हिंदी में लाल चींटी कहा जाता है. इस क्षेत्र का आदिवासी समुदाय इन चींटियों का परंपरागत रूप से सेवन करते आ रहे हैं. इस क्षेत्र के आदिवासी इन लाल चींटियों की चटनी बनाकर खाते हैं. चींटियों के साथ मिर्च, लहसुन आदि को पीस कर यह चटनी बनाई जाती है. इन चींटियों में फार्मिक एसिड की मात्रा पाये जाने के कारण इनका स्वाद खट्टा होता है तथा इनमें विटामिन सी की भरपूर मात्रा पायी जाती है, जो इनका सेवन करनेवालों में विटामिन सी की कमी पूरी करने का काम करती है. (नीचे भी पढ़ें)

खुद को आधुनिक माननेवाला समाज जहां इसके लिए केमिकल दवाइय़ों की शरण लेने को विवश होता है, वहीं अनजाने में ही आदिवासी इन चींटियों का सेवन कर विटामिन सी की कमी से बचे रहते हैं और उनकी रोग प्रतिरोधक क्षमता भी बढ़ जाती है. परंपरागत रूप से आदिवासी मलेरिया व डेंगू जैसी बीमारियों के इलाज के रूप में भी इन लाल चींटियों का सेवन करते हैं. आदिवासी समुदाय की मान्यता के अनुसार इन लाल चीटिंयों के नियमित सेवन से चेचक, पेचिश, सर्दी-खांसी और गर्मियों में लू से भी बचाव होता है.(नीचे भी पढ़ें)

इसके कई औषधीय लाभ होने के कारण भी आदिवासी समुदाय परंपरागत रूप से इसकी चटनी बना कर सेवन करता आ रहा है. हालांकि इन लाल चींटियों को प्राप्त करना बहुत आसान नहीं होता. ये बड़ी ही हमलावर किस्म की चींटियां हैं, जो मौका मिलते ही बहुत जोरदार तरीके से काटती हैं, किन्तु आदिवासी समुदाय पेड़ों से इन्हें व इनके अंडों को एकत्र कर उसकी चटनी बनाते हैं. कुछ लोग इन चींटियों का सूप बनाकर पीना भी पसंद करते हैं. यही नहीं, परंपरागत रूप से आदिवासी समाज में किसी को बुखार होने पर उसे चींटियों वाले पेड़ के पास ले जाकर चींटियों से कटवाया भी जाता है. आदिवासी मान्यता के अनुसार इन चींटियों के काटने से बीमार व्यक्ति का बुखार जल्द ही ठीक भी हो जाता है.





