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jharkhand-big-politics-झारखंड में सियासत तेज, राजभवन पर निगाहें, जा सकती है हेमंत सोरेन और बसंत सोरेन की ”विधायकी”, ऐसे ही मामले में जा चुकी है सोनिया गांधी और जया बच्चन की ”सांसदी”, जाने क्या है मामला, jmm-झामुमो ने कहा-मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं बनता है मामला, चुनाव आयोग केंद्र के ईशारे पर ले सकता है गलत फैसला, यह डर तो जरूर है, bjp-भाजपा बोली-हेमंत सोरेन गलत किये है, सजा मिलेगी, सरकार जायेगी, जानें क्या चल रहा है झारखंड की सियासत में, क्या है यह कानून, जिसके दायरे में फंस चुका है ”सोरेन परिवार”

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राज्यपाल रमेश बैस और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन.

रांची : झारखंड में सियासी माहौल गर्म हो चुका है. इस सियासी माहौल की वजह यह है कि राज्यपाल रमेश बैस नयी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात कर चुके है और वे वापस भी लौट गये है. राजभवन से जो सूचनाएं आ रही है, उससे यहीं लग रहा है कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनके छोटे भाई सह दुमका से विधायक बसंत सोरेन की विधानसभा की सदस्यता खतरे में है. अगर इन दोनों की सदस्यता जाती है तो गठबंधन की सरकार मुश्किलों में फंस सकता है. यह संभव है कि अब नया नेतृत्व के भरोसे सरकार बनाना होगा. ऐसी परिस्थितियों को लेकर भी झामुमो में अंदर ही अंदर तैयारियां चल रही है. अगर सदस्यता हेमंत सोरेन की जाती है तो कल्पना सोरेन को दुमका सीट से चुनाव लड़ाया जा सकता है जबकि फिर से बरहेट से चुनाव लड़ाया जा सकता है. सरकार बनाने की स्थिति में कल्पना सोरेन सरकार चला सकती है. सिर्फ 25 विधायक होने के कारण भाजपा सरकार बनाने की स्थिति में नहीं होगी क्योंकि बहुत ज्यादा सीट गड़बड़ होगा तो तीन से चार सीट ही गड़बड़ हो सकता है. चूंकि, कांग्रेस के एक विधायक बंधु तिर्की की सदस्यता समाप्त हो चुकी है, इस कारण उनके एक विधायक कम हो चुके है, लेकिन फिर भी संकट सरकार पर नहीं है, लेकिन उथल-पुथल तो जरूर मच जा सकती है. फिलहाल, हेमंत सोरेन कानून के जानकारों की मदद ले रही है ताकि इस संकट को टाला जा सके. (नीचे देखे पूरी खबर)

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और मुख्यमंत्री के भाई सह विधायक बसंत सोरेन.

क्या है पूरा मामला, क्या कहता है कानून
राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रघुवर दास ने एक शिकायत की थी कि हेमंत सोरेन द्वारा खुद के नाम खनन पट्टा लिया गया है. इस कंपनी में पार्टनर के तौर पर उनके भाई और दुमका से विधायक बसंत सोरेन है. बसंत सोरेन के अलावा कल्पना सोरेन के खिलाफ भी यह कहा गया है कि सोहराय लाइव स्टॉक प्राइवेट लिमिटेड कंपनी को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षणत चार औद्योगिक भूखंड आवंटित किये गये है. इनका कुल रकबा करीब 12 एकड़ है. मुख्यमंत्री रहते हुए चार भूखंडों को अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित करवाया और फिर इन्हें अपनी पत्नी की कंपनी के नाम आवंटित कर दिया. यह मामला राजभवन पहुंचा. इसके बाद राज्यपाल ने मामले को चुनाव आयोग भेज दिया जबकि खुद राज्यपाल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह से जाकर मिल लिये. भाजपा की ओर से की गयी शिकायत में कहा गया है कि हेमंत सोरेन खनन पट्टा लेना और बसंत सोरेन का एक खनि कंपनी में पार्टनर होना, गृह मंत्रालय की ओर से मंत्रियों के लिए जारी आचार संहिता का उल्लंघन है. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम 1988 की धारा 13 (1) (डी) के तहत अपराध है. भाजपा ने यह मांग की है कि विधानसभा के सदस्यों की निहर्ता से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 192 के तहत निर्वाचन आयोग की राय लेकर इनकी सदस्यता को निरस्त की जाये. राज्यपाल को निर्वाचन आयोग की राय का इंतजार है. (नीचे देखे पूरी खबर)

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और उनकी पत्नी कल्पना सोरेन.

झामुमो सारे विकल्पों पर काम कर रही है, कानूनी जानकारों से ले रही है राय
झामुमो और मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन देश के कानूनी जानकारों से राय ले रहे है ताकि ऑफिस ऑफ प्रोफिट (लाभ के पद का दोहरा लाभ) लेने के मामले में कोई राहत मिल सके. कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी भी हालात पर नजर बनाये हुए है और कहीं न कहीं मामला फंसा हुआ नजर आ रहा है. वैसे यह देखा जा रहै हि कि कहीं न कहीं कोई न कोई गलती जरूर हो गयी है, जिस कारण बीच का रास्ता निकाला जा रहा है. हर विकल्प की तलाश सरकार कर रही है. यह माना जा रहा है कि मुख्यमंत्री स्वेच्छा से लीज सरेंडर नहीं किया है. जब सबके संज्ञान में यह मामला आया है, तब उन्होंने लीज सरेंडर कर दिया है.
लाभ का पद लेने का मामला कोई नयी बात नहीं, सोनिया गांधी और जया बच्चन गंवा चुकी है संसद की सदस्यता ऑफिस ऑफ प्रोफिट यानी लाभ के पद को लेकर पहले भी सदसयता जा चुकी है. झारखंड में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन लाभ का पद और भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 के आरोपी बनाये गये है क्योंकि वे मुख्यमंत्री रहते हुए माइनिंग लीज ले ली थी. इस मसले को लेकर चर्चा काफी तेज हो चुका है. चुनाव आयोग के आदेश का इंतजार है और राजभवन की ओर नजरें टिकी हुई है. (नीचे देखे पूरी खबर)

सोनिया गांधी और जया बच्चन.

सोनिया गांधी और जया बच्चन की जा चुका है संसद की सदस्यता
इस कानून को लेकर अभी चर्चाएं तेज हो चुकी है. इस कानून के कारण कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी और बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन की सांसद पत्नी जया बच्ची को संसद की सदस्यता गंवानी पड़ी है. लाभ का पद मामले में भारत में पहले भी कार्रवाई हो चुकी है. वर्ष 2006 में जब यूपीए की सरकार थी, तब कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी पर लाभ का पद का मामला लाया गया था. उस समय सोनिया गांधी रायबरेली से सांसद थी. इसके अलावा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार में सोनिया गांधी राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की अध्यक्ष भी थी, जिसे लाभ का पद बताया गया था. इसके चलते रायबरेली की सीट से उनको हटा दिया गया था और फिर से उनको चुनाव लड़ना पड़ा था. इसी तरह जया बच्चन 2006 में राज्यसभा की सांसद थी. उनको उत्तर प्रदेश फिल्म विकास निगम का अध्यक्ष भी बनाया गया था. चुनाव आयोग ने तब जया बच्चन को लाभ का पद मामले में अयोग्य ठहराया था, जिसके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका जया बच्चन ने दायर की थी, लेकिन संसद की सदस्यता समाप्त कर दी गयी थी. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में फैसला दिया था कि अगर किसी सांसद या विधायक ने लाभ का पद लिया है तो उसकी राज्यसभा, लोकसभा या विधानसभा की सदस्यता निरस्त हो जायेगी, चाहे उसने लाभ का पद से वेतन या दूसरे भत्ते लिये हो या नहीं लिये हो. (नीचे देखे पूरी खबर)

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सुप्रीम कोर्ट

जानिये क्या है लाभ का पद यानी ऑफिस ऑफ प्रोफिट
संविधान के अनुच्छेद 102 (1) (ए) कहता है कि कोई भी सांसद या विधायक ऐसे किसी पद पर नहीं हो सकता है, जहां वेतन, भत्ता या प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रुप से किसी दूसरी तरह के फायदे मिलते हो. इसके अलावा संविधान के अनुच्छेद 191 (1) (ए) और भारतीय जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 9 (ए) के तहत भी सांसदों और विधायकों को किसी दूसरे मद से लाभ या अन्य पद लेने पर साफ तौर पर मनाही है. लोकप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 संसद सदस्यों और राज्य विधानमंडल के सदस्यों के भ्रष्ट आचरन और अन्य अपराधों के खिलाफ भी कड़ी कार्रवाई की अनुशंसा करती है. भारती संविधान के अनुच्छेद 327 के तहत जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 को संसद द्वारा पारित किया गया है. यह इन बातों की पुष्टि करता है कि संसद और राज्य विधानसभा में सदस्य बनने के लिए क्या योग्यताएं और क्या अयोग्यताएं होती हैं. जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 (4) में यह भी प्रावधान है कि कोई भी जनप्रतिनिधि अगर किसी भी मामले में दोषी ठहराये जाने की तिथि से तीन माह तक अदालत में अपील दायर करता है तो उसका निबटारा होने की तिखि तक वह अपने पद से अयोग्य घोषित नहीं किया जा सकता है. इसके तहत इन कारणों से सदस्यता जा सकती है. इसमें चुनाव से जुड़े अपराध और चुनाव में भ्रष्टाचार के दोषी करार दिये जाने पर, किसी भी अपराध में दोषी करार दिये जाने और दो साल जेल की सजा मिलने पर, भ्रष्ट आचरन के दोषी पाये जाने पर, भ्रष्टाचार या राजद्रोह के मामले में, किसी भी सरकारी कंपनी से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष लाभ लेने पर, रिश्वतखोरी के कराण, सामाजिक सौहार्द बिगाड़ने, छुआछूत, दहेज सरीखे सामाजिक अपराध में संलिप्तता पर, संविधान के अनुच्छेद 192 (2) में राज्यपाल को किसी भी जनप्रतिनिधि को हटाने के मामले में चुनाव आयोग से मंतव्य मांगने का अधिकार है. आयोग के मंतव्य के आधार पर राज्यपाल अपना फैसला लेते है जबकि जनप्रतिनिधित्व कानून 1951 की धारा 8ए, 9 और 9 ए का उल्लंघन होने या लाभ के पद पर रहते हुए भ्रष्ट आचरण अपनाने पर संसद या विधानसभा की सदस्यता समाप्त करने का प्रावधान है. (नीचे देखे पूरी खबर)

रांची में शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन करते सुदिव्य कुमार और सुप्रियो भट्टाचार्य.

हेमंत सोरेन के मामले में उत्पन्न संकट के बीच झामुमो ने दिये यह बयान
रांची में झामुमो की ओर से शुक्रवार को संवाददाता सम्मेलन किया गया. गिरीडीह विधायक सुदिव्य कुमार और झामुमो के केंद्रीय प्रवक्ता सुप्रियो भट्टाचार्य ने संयुक्त रुप से संवाददाता सम्मेलन किया और कहा कि माइंस लीज मामले को दंडनीय अपराध पुलिस बता रही है जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 1964 से लेकर 2006 के तहत अपने फैसलों में स्पष्ट कहा गया है कि धारा 9 ए में माइनिंग लीज का मामला नहीं आता. दिल्ली हाईकोर्ट के एक फैसले का हवाला देते हुए विधायक सुदिव्य ने कहा कि किसी तरह का फैसला देने से पहले भारत निर्वाचन आयोग को पीड़ित पक्ष की बातों को सुनना होगा. इन लोगों ने कहा कि झामुमो और मुख्यमंत्री की बात को जरूर सुना जायेगा. उन्होंने कहा कि जिस तरह से संवैधानिक संस्थाओं पर हमले हो रहे है, उससे हो सकता है कि केंद्रीय नेतृत्व के दबाव में आयोग एकपक्षीय फैसला ना ले लें. सुदिव्य कुमार ने कहाकि 2018 में दिल्ली हाईकोर्ट ने कहा था कि हर हाल में ऐसे मामले में शिकायतकर्तां की बातों को सुना जाना चाहिए. कैलाश गहलोत बनाम इलेक्शन कमीशन ऑफ इंडिया में यह फैसला सुनाया था. उन्होंने कहा कि एक एकड़ से कम माइंस होने के कारण इसका निष्पादन उपायुक्त द्वारा किया गया था. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन का लीज 80 डेसिमल का है यानी जो भ्रम फैलाया जा रहा है कि खनन मंत्री रहते हुए मुख्यमंत्री ने खनन अपने नाम किया, वह गलत है. माइंस में अभी तक कोई खनन नहीं हुआ है. बिजली तक नहीं पहुंची है. जीएसटी भी नहंी लिया गया है, ऐसे में लाभ का कोई मामला ही नहीं बनता है. विधायक ने बताया कि कोई व्यक्ति जब किसी बात को छुपाता है तो मामला अपराध बनता है. लेकिन माइंस लीज मामले में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने स्पष्ट तौर पर अपने चुनावी घोषणा पत्र में जिक्र किया है कि उनके नाम पर एक माइंस है, फिलहाल नवीकरण के लिए पेंडिंग है. इन लोगों ने पूर्व सीएम रघुवर दास पर हमला बोला और कहा कि रघुवर दास के कार्यकाल में मैनहर्ट घोटाला, टॉफी बिस्कुट घोटाला हुआ है, जो जांच एजेंसियों के पास है. इन लोगों ने कहा कि 25 विधायकों वाली भाजपा कभी भी यह तय नहीं कर सकती कि सरकार किस पार्टी या किस गठबंधन का होगा. (नीचे देखे पूरी खबर)

भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव.

भाजपा ने कहा-कोर्ट और राज्यपाल पर दबाव बाने की कोशिश कर रही है हेमंत सोरेन सरकार
भाजपा के प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने भी शाम को इस मसले को लेकर संवाददाता सम्मेलन किया है. रांची में आयोजित इस संवाददाता सम्मेलन में प्रतुल शाहदेव ने कहा है कि सरकार राज्यपाल और कोर्ट पर दबाव बनाने की कोशिश कर रही है. चुनाव आयोग के खिलाफ बयानबाजी कर दबाव बनाया जा रहा है. झामुमो जितना भी दलीले दें, यह गलत है कि वह मुख्यमंत्री रहते हुए खनन कार्य करने के लिए अपने नाम लीज लिया, जमीन अपनी पत्नी के नाम ली और उनके भाई भी इसके हिस्सेदार रहे, ऐसे में ऐसे लोगों पर कार्रवाई तय है. ऐसे लोगों के खिलाफ आयोग न्याय करेगा. इन लोगों ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट ने ऐसे ही मामले में कई सारे फैसले सुना चुकी है, इस कारण इसमें बचाव का रास्ता अपनाने की कोशिश की जा रही है और रोज एजेंडा फैलाया जा रहा है और दबाव बनाने की कोशिश की जा रही है.

Team Sharp Bharat B

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