रांची : भाजपा प्रदेश अध्यक्ष आदित्य साहू ने झामुमो सहित विपक्षी पार्टियों द्वारा खनिज संशोधन विधेयक की खिलाफत को केवल राजनीतिक ड्रामा करार दिया है. उन्होंने कहा कि मोदी सरकार द्वारा लाये जा रहे एमएमडीआर विधेयक का उद्देश्य राज्य का अधिकार छीनना नहीं, बल्कि खनिज क्षेत्र में पारदर्शिता, समानता, निवेश और विकास को गति देना है. यह विधेयक देश के खनन क्षेत्र को अधिक कुशल, अनुकूल निवेश और महत्वपूर्ण खनिजों की जरूरत पूरी करने के उद्देश्य से लाया गया है. यह संशोधन केवल झारखंड के लिए नहीं है बल्कि पूरे देश के संदर्भ में किया गया है. श्री साहू ने कहा कि झामुमो आंदोलन और आर्थिक नाकेबंदी की धमकी देकर राज्य में विकास की रफ्तार रोकना चाहती है. केंद्र की जनहितकारी नीतियों को राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय झामुमो को विकास, पारदर्शिता और रोजगार के मुद्दे पर जवाब देना चाहिए. झारखंड की जनता अब इस राजनीति को पूरी समझ चुकी है. झारखंड सरकार और झामुमो जितनी ऊर्जा एवं ताकत इस विधेयक पर राज्य वासियों को भ्रमित करने पर खपत कर रही है उतनी ऊर्जा खनिजों के अवैध खनन और इसमें व्याप्त भ्रष्टाचार को रोकने में लगाती तो राज्य का कायाकल्प हो जाता. (नीचे भी पढ़ें)
आदित्य साहू ने कहा कि खनिज संशोधन विधेयक को लेकर झामुमो सहित विपक्ष की सारी आशंकाएं एवं आरोप, बेबुनियाद और निराधार हैं. विधेयक का उद्देश्य राज्यों का खनन राजस्व छीनना कतई नहीं है। विधेयक को लेकर झारखंड सरकार और विपक्ष का आरोप कि राज्यों का खनिज राजस्व छिन जाएगा, पूरी तरह निराधार है. राज्यों को खनिज राजस्व का बड़ा हिस्सा मिलता रहेगा, लेकिन कोई भी राज्य मनमाने ढंग से लगातार बढ़ते उपकर के जरिए पूरे खनन उद्योग की प्रतिस्पर्धात्मकता खत्म नहीं कर सकता. रॉयल्टी, डीएमएफ़, नीलामी प्रीमियम, एनएमईटी और जीएसटी में राज्यों की हिस्सेदारी यथावत रहेगी तथा खनन क्षेत्र से होने वाले भुगतानों का लगभग 90 प्रतिशत राज्यों को प्राप्त होता रहेगा. लघु खनिजों पर राज्यों का नियंत्रण पूर्ववत रहेगा. बालू, गिट्टी और साधारण मिट्टी जैसे लघु खनिजों पर राज्य की वर्तमान शक्तियों पर इस विधेयक का कोई प्रभाव नहीं होगा. श्री साहू ने कहा कि मुख्यमंत्री द्वारा आदिवासी, दलित और पिछड़ों पर इस विधेयक का असर पड़ने वाला बयान भ्रामक है. खनिज संपदा का पूरा लाभ खनन प्रभावित क्षेत्रों और गरीबों तक पहुंचाना भाजपा और नरेंद्र मोदी की प्राथमिकता है. भाजपा का मानना है कि राज्य की खनिज संपदा का लाभ अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे और खनन प्रभावित क्षेत्रों का सर्वांगीण विकास तेज हो. मुख्यमंत्री को इस पर राजनीति करने की बजाय, अपने कार्यकाल में उनके लिए किए गए विकास कार्यों का हिसाब देना चाहिए. भाजपा चाहती है कि खनन से मिलने वाले राजस्व का पारदर्शी और प्रभावी उपयोग आदिवासी, दलित, गरीब, पिछड़े और विस्थापित परिवारों के विकास में हो. परंतु राज्य सरकार इसमें फिसड्डी साबित हुई है. सारंडा का पिछड़ापन इसका बड़ा उदाहरण है. (नीचे भी पढ़ें)
वहीं श्री साहू ने झारखंड के साथ भेदभाव के आरोप को भी गलत बताया और कहा कि केंद्र अगर झारखंड के प्रति संवेदनशील नहीं है तो राज्य को लगातार केंद्रीय योजनाओं और संसाधनों का लाभ कैसे मिल रहा है, मुख्यमंत्री को बताना चाहिए. उन्होंने कहा कि आंकड़े कभी झूठ नहीं बोलते हैं. साल 2014-15 में कुल खनिज राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी महज 60 प्रतिशत थी, जो 2024-25 में बढ़कर 88 प्रतिशत प्लस हो गई. वहीं पिछले 10 साल यानि 2014-15 से 2024-25 के बीच राज्यों का खनिज राजस्व करीब 354 प्रतिशत बढ़कर 25,206 करोड़ रुपए से 1,14,549 करोड़ रूपया हुआ है. इन आंकड़ों से जनता खुद विचार करेगी कि केंद्र राज्यों का खनिज राजस्व छीन रहा है, यह आरोप विपक्षियों द्वारा बेवजह और झूठा नहीं तो क्या है? (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा कि झारखंड सरकार ने लौह अयस्क पर 600 रुपए प्रति टन का फ्लैट उपकर लगा दिया, जबकि छत्तीसगढ़ में यह 22.50 प्रति टन है. कोयले पर भी राज्य सरकार ने डेढ़ साल से भी कम समय में उपकर 100 रुपए से बढ़ाकर 450 रुपए प्रति टन कर दिया. इस दौरान बीसीसीएल का 2025-26 का उत्पादन 40.50 मिलियन टन से घटकर 35.52 मिलियन टन हो गया. यानी उत्पादन में 12.3 प्रतिशत की गिरावट दर्ज हुई. ऐसा नहीं है कि अधिकतम कर लगाकर अधिकतम राजस्व हासिल किया जा सकता है. सेस के कारण झारखंड को नुकसान हुआ है. अधिकतम कर लगाने से राज्य के अवैध माफियाओं की चांदी है. बीसीसीएल में कोयला चोरी को राज्य सरकार नियंत्रित नहीं कर पाई, केंद्र सरकार को फोर्स भेजना पड़ा. श्री साहू ने कहा कि झारखंड सरकार की नीयत साफ होती तो झूठा राग अलापने की बजाय वह खदानें चालू करती. कितनी शर्मनाक बात है कि देश के करीब 40 प्रतिशत खनिज भंडार रखने वाला यह राज्य अपनी अकूत खनिज संपदा का अपेक्षित उपयोग तक नहीं कर पा रहा है. पिछले 6 वर्षों में यहां केवल 4 खदानों की नीलामी हुई. आश्चर्यजनक बात है कि इसमें एक भी संचालन में नहीं आ सकी. वहीं पड़ोसी राज्य ओडिशा ने 35 खदानें चालू कर करीब 87,000 करोड़ रुपए का नीलामी प्रीमियम प्राप्त किया, जबकि झारखंड को नीलामी प्रीमियम से शून्य प्राप्त हुआ.(नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा कि जल, जंगल और जमीन की बात करने वाली झामुमो की हेमंत सोरेन सरकार ने पिछले 7 साल में इनका ही दोहन करने का काम किया है. खनिज संपदाओं को तो इस सरकार ने लूटकर और लुटवाकर राज्य को खोखला कर दिया है. इसलिए झामुमो का इसके खिलाफ आंदोलन केवल अपनी राजनीतिक जमीन बचाने की कवायद है. झामुमो को झारखंड की जनता को गुमराह करने के बजाय यह बताना चाहिए कि राज्य में वर्षों से चल रहे अवैध खनन, खनिजों की लूट और राजस्व के नुकसान पर उसकी सरकार ने क्या कार्रवाई की? श्री साहू ने कहा कि झारखंड सरकार आदिवासी कल्याण, मंईया सम्मान योजना, अबुआ आवास के नाम पर भ्रम फैलाने, केंद्र पर दोषारोपण करने की बजाय राज्य सरकार को अपने डीएमएफ़टी फंड के इस्तेमाल का हिसाब देना चाहिए. डीएमएफटी फंड की बंदरबांट कैसे की गई है, यह किसी से छुपा नहीं है. बालू और पत्थर खदानों के नीलामी न होने से राज्य को लगातार खनन राजस्व का नुकसान हो रहा है. श्री साहू ने कहा कि भाजपा स्पष्ट करना चाहती है कि झारखंड के खनिज संसाधनों पर पहला अधिकार झारखंड की जनता के विकास का है, लुटेरों और माफियाओं का नहीं. भाजपा हर मंच पर विधेयक के तथ्यों को जनता के सामने रखेगी और झामुमो के झूठ एवं भ्रम का जवाब देगी.




