सारंडा के बीहड़ बुरुगुलीकेरा से ग्राउंड जीरो से ब्रजेश सिंह

चाईबासा : झारखंड में पत्थलगढ़ी को लेकर अब तक का सबसे बड़ा नरसंहार पश्चिम सिंहभूम जिले के गुदड़ी थाना क्षेत्र स्थित बुरुगुलीकेरा गांव में हुआ है. सात लोगों ने स्वशासन व्यवस्था के जरिये पहले बकायदा आमसभा लगायी गयी. इस आमसभा में नौ लोगों को मौत की सजा सुनायी गयी. नौ लोगों को जैसे ही मौत की सजा सुनायी गयी, वैसे ही दो लोग भाग गये, जिसके बाद सात लोगों को जनता के बीच ही बांधकर सिर से धड़ को काटकर मार डाला गया और दूर जंगलों में शव को फेंक दिया. इस बड़ी घटना के पीछे वैसे तो पुलिस पत्थलगढ़ी की आड़ में वर्चस्व की लड़ाई मानकर पूरे कांड पर ही परदा डालना चाह रही है, लेकिन हालात कुछ और ही बयां कर रहे है. पत्थलगढ़ी की जिस गांव बुरुगेलीकेरा में इस नृशंसा नरसंहार को अंजाम दिया गया है, वहां जाने के लिए अगर आप सोनुवा से आगे गोईलकेरा पार करने के बाद सारंडा के बीहड़ों में घुसते है तो आपको स्वत: समझ आ जायेगा कि कैसी स्थिति है.

बुरुगुलीकेरा गांव तक पहुंचने के पहले लगभग सभी गांवों के बाहर पत्थलगढ़ी लगा दी गयी है. इसमें स्वशासन व्यवस्था को लेकर दिये गये नियमों का उल्लेख किया गया है और अपने गांव में अपने राज की पूरी कहानी लिखी गयी है. पुराने पत्थरों के अलावा नये पत्थरों को भी बकायदा चूना यानी सफेद रंग से रंगरोगन कर पत्थरों को लगा दिया गया है. अन्य गांवों के साथ-साथ बुरुगुलीकेरा में भी इस तरह का पत्थलगढ़ी का पत्थर लगाया गया है और स्वशासन व्यवस्था की जानकारी दी गयी है. बुरुगुलीकेरा गांव में नरसंहार के बाद से पूर्व मुखिया के पति समेत पत्थलगढ़ी के सारे समर्थक सफेद रंग के कपड़ों में ही नजर आ रहे थे. कपड़ों के अलावा पूर्व मुखिया के पति के घर में बकायदा एलइडी टीवी से लेकर हर सुख सुविधा की व्यवस्था है, जो उसके समृद्ध होने की कहानी बयां कर रही थी. इस पूरे काम के लिए लोगों के पास पैसे कहां से आ रहे है, यह सवाल उठना लाजिमी इसलिए है क्योंकि उस इलाके में सारे लोग किसी तरह अपना गुजर बसर करते है. तन ढंकने के लिए लोगों के पास ठीक से कपड़ा तक नहीं है तो खाने को अनाज का भी अभाव है. सरकारी तंत्र पहुंचती नहीं है. ऐसे में ऐसे लोगों के पास कहां से पैसे आ रहे है, यह बड़ा सवाल उठ रहा है. इसके अलावा जब आप बुरुगुलीकेरा गांव पहुंचेंगे, उसके आगे और उसके पीछे के गांवों के बाहर लगातार करीब छह चर्च बन रहे है, जो ईसाई मिशनरियों की सहभागिता और उनकी सक्रियता को भी दर्शा रहा है. वहां नये चर्च बन रहे है. बड़े पैमाने पर धर्मांतरण कर आदिवासी समुदाय के लोग ईसाई बन चुके है और लगभग सारे गांवों में नये चर्च बन रहे है. जो पुराने चर्च है, उसका भी जीर्णोद्धार हो रहा है. खूंटी में पिछली बार जो पत्थलगढ़ी की घटना घटी थी, उस घटना में भी ईसाई मिशनरियों के हाथ साबित हुए थे और एक पादरी को भी जेल भेजा गया था. अब नया मामला यहां सामने आया है. घोर नक्सल प्रभावित इलाके होने के कारण वहां तक लोग पहुंच भी नहीं पाते है, लेकिन हरेक गांवों में कुछ लोगों के पास पैसे है, जो ईसाई बन रहे है. हालात ऐसे है, जो सवाल उठाने को मजबूर कर रहा है और ईसाई मिशनरियों के हाथ होने का संदेह भी उत्पन्न कर रहा है.








