
आदित्यपुरः सरायकेला जिले में जमीन का खेल का नया मामला सामने आया है. आपको बता दें कि पिछले दिनों हमने आपको कुलुपटांगा मौजा के खाता नम्बर 81 के प्लॉट नम्बर 737 और 743 के सरकारी जमीन पर बने स्कूल और तालाब को भू- माफियाओं द्वारा बेचे जाने की खबर दिखाई थी. मामला प्रकाश में आते ही प्रशासनिक महकमे में खलबली मची और 25 अवैध कब्जाधारियों को नोटिस जारी कर दिया गया. हालांकि अभी कार्रवाई नहीं हुई है. उल्टा वहां राजीनीतिक बयानबाजी शुरू है. कांग्रेस और झामुमो गरीबों को किसी कीमत पर नहीं उजाड़े जाने देने का दावा करते सुने जा रहे हैं, जबकि सांसद गीता कोड़ा ने तो यहां तक कह डाला, कि सालों से बसे लोगों को हटाने के बजाय उन्हें मालिकाना हक दे दिया जाए. चलिए ये काम प्रशासन और सरकार को करना है. अब हम आपको इसी जिले के एक और मामले से रु- ब- रु कराते हैं. दरअसल जिस सरकार के सत्ताधारी दल और उसके सहयोगी दल कांग्रेस और कांग्रेसी सांसद सरकारी जमीन पर बसे गरीबों को उजाड़े जाने के विरोध में खड़ी है उसी सरकार का सरकारी विभाग झारखंड राज्य आवास बोर्ड पिछले 30 वर्षों से एक छोटे से टुकड़े पर घर बनाकर किसी तरह से जीवन बसर कर रहे एक परिवार के पीछे हाथ धोकर पड़ा है. मामला आवास बोर्ड के कोर्ट तक जा पहुंचा. जाहिर सी बात है गरीब की सुनवाई कोर्ट में कैसे होगी.. आवास बोर्ड को गरीब की जमीन पर कब्जा करने का अधिकार मिल गया. आवास बोर्ड के भारी- भरकम अधिकारियों ने गरीब को नोटिस भेजकर भूखंड खाली करने के लिए 48 घंटे का अल्टीमेटम जारी कर दिया. गरीब परिवार लाचार बेबस सरकार, जिला प्रशासन और आवास बोर्ड से इंसाफ की गुहार लगा रहा है. मामला दिंदली मौजा का है. जिसमें जमीन मालिक विनय कुमार महतो ने 17 नवंबर 2002 को खाता संख्या 16 प्लॉट संख्या 1371 जो उनके तालाब का बांध था उसमें से दो हजार वर्गफीट जमीन लक्ष्मण रजक और सनातन महतो को दान दिया था. आवास बोर्ड उसे अपना बताकर किसी रामवती देवी को अलॉट करने की बात कर रहा है. रामवती देवी आवास बोर्ड के बड़ा बाबू की पत्नी बतायी जा रही है. इस संबंध में सनातन महतो और लक्ष्मण रजक के परिजनों ने बताया, कि उनके द्वारा 2004 में ही आवास बोर्ड से उक्त भूखंड को अलॉट किए जाने संबंधी आवेदन दी गई थी. बावजूद इसके उक्त भूखंड उन्हें अलॉट न कर आवास बोर्ड के ही बड़ा बाबू को 2012 में अलॉट कर दिया गया. इस संबंध में जब आवास बोर्ड के कार्यपालक अभियंता से हमने विभाग का पक्ष जानने का प्रयास किया तो उन्होंने कैमरे के समक्ष आने से इंकार कर दिया और बड़ा बाबू अपने दफ्तर से गायब मिले. अब सवाल ये उठता है कि झारखंड सरकार और सरकारी विभाग में ये कैसा खेल चल रहा है. एक तरफ सरकारी दल झामुमो और कांग्रेस कहती है, कि सरकारी जमीन पर बने मकानों को किसी कीमत पर तोड़ने नहीं दिया जाएगा. दूसरी तरफ सरकारी विभाग वर्षों से छोटे से भूखंड पर आशियाना बनाकर रह रहे गरीब परिवारों को बेदखल कर अपने ही विभाग के अधिकारी को जमीन आवंटित कर रहा है. वैसे पूरा मामला जांच का बनता है. सरकार और जिला प्रशासन को जांच कर दोषियों पर कार्रवाई करनी चाहिए.



