
जमशेदपुर : टाटा स्टील और जमशेदपुर में बोनस काफी चर्चित चीज होती है क्योंकि यह शहर लौहनगरी है और यहां के कर्मचारियों और कंपनी के कारण ही यह शहर है. जमशेदपुर में पहली बार बोनस जानते है आप किसके कारण शुरू हुई थी. इसका नाम प्रोफिट शेयरिंग बोनस कहा जाता है, जिसको हिंदी में मुनाफा पर मिलने वाली राशि को बोनस कहा जाता है. इस राशि की शुरुआत टाटा स्टील में 1934 में शुरू हुई. 1934 में बोनस की शुरुआत टाटा स्टील के तत्कालीन निदेशक सर आर्देशिर दलाल ने शुरू करायी थी, जो देश भर में पहली ऐसी कंपनी थी, जो प्रोफिट पर बोनस कर्मचारियों को देने की शुरुआत की, जो बाद में चलकर भारतीय श्रम कानून में एक अधिनियम के तौर पर बन गया. सर अर्देशिर दलाल का जन्म 24 अप्रैल, 1884 को बॉम्बे के एक शेयर-ब्रोकर रुस्तमजी दलाल के घर हुआ था. उन्होंने एलफिंस्टन कॉलेज, बॉम्बे से स्नातक किया. सर दलाल ने 1905 में जे एन टाटा स्कॉलरशिप प्राप्त की और उच्च अध्ययन के लिए इंग्लैंड चले गए. वे भारतीय सिविल सेवा (आईसीएस) परीक्षा में बैठे और प्रथम स्थान पर रहे. 1908 में उन्होंने आईसीएस ज्वाइन किया. सर दलाल 1928 में बॉम्बे के नगर आयुक्त (म्युनिसिपल कमिशनर) बनने वाले पहले भारतीय बने. 1931 में सर आर्देशिर दलाल टाटा स्टील के निदेशक के रूप में टाटा समूह से जुड़े और 1941 तक सेवा की. 1945 में वे दोबारा जुड़े और 1949 तक मृत्युपर्यंत काम किया. 1934 में उन्होंने ही टाटा स्टील में लाभ साझाकरण बोनस योजना शुरू की, जो भारत में किसी भी निजी या सार्वजनिक प्रतिष्ठान द्वारा पहली बार लागू किए गए कई श्रमिक कल्याणकारी उपायों (जैसे कि आठ घंटे कार्य दिवस, वेतन, मातृत्व लाभ, आदि के साथ) में से एक था. इस योजना को बाद में भारत सरकार ने भी अपनाया और इसको श्रम कानून में जगह दी. उन्होंने भारतीयकरण कार्यक्रम में भी सहयोग किया, जिसके कारण टाटा स्टील में प्रमुख पदों पर भारतीयों की नियुक्ति हुई. इससे श्रम बल का विश्वास बढ़ा और उनकी शिकायतों को बेहतर तरीके से संबोधित किया गया. सर दलाल ने 1932 में पहली बार आंतरिक द्विभाषीय (अंग्रेजी और हिंदी) प्रकाशन ‘टिस्को रिव्यू’ शुरू किया. इस प्रकाशन ने विभागीय नोट्स, स्पोर्ट्स गॉसिप, यात्रा-वृत्तांत, वेलफेयर नोट्स आदि सहित कई लेख प्रकाशित किए. 1939 में उन्हें नाइट कमांडर (केसीआईई) की उपाधी दी गयी. जून 1944 में भारत के तत्कालीन वायसराय लॉर्ड वेवेल ने उन्हें योजना और विकास के प्रभारी सदस्य के रूप में कार्यकारिणी परिषद (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया. वे 1945 में तैयार की गई भारत सरकार की योजना के वास्तुकारों में से एक थे. वे 1944 में प्रकाशित बॉम्बे प्लान के आठ लेखकों में से एक थे. उन्हें 1947 में वाईस चेयरमैन बनाया गया. 8 अक्टूबर, 1949 को सर अर्देशिर दलाल का निधन हो गया. उनके सम्मान में जमशेदपुर के अस्पताल-सह-नर्सिंग कॉलेज ”अर्देशिर दलाल मेमोरियल हॉस्पीटल” का नाम रखा गया है.



