
जमशेदपुर : टाटा वर्कर्स यूनियन में संवैधानिक संकट की स्थिति उत्पन्न हो गयी है. कमेटी मेंबरों की आवाज को ही दबाने की कोशिशें शुरू हो गयी है. यूनियन में अगर कमेटी मेंबर मजदूरों के हित या अहित को लेकर सवाल नहीं उठा पाये तो इससे दुर्भाग्य की क्या बात हो सकती है. संवैधानिक स्थिति भी इसी से जुड़ा हुआ है. करीब 80 कमेटी मेंबरों ने एक लिखित आवेदन अध्यक्ष आर रवि प्रसाद और महामंत्री सतीश सिंह को दिया था. इन दोनों नेताओं को रिक्वीजिशन मीटिंग सिर्फ वेज रिवीजन के मुद्दे पर बुलाने की मांग की थी ताकि कर्मचारियों की भावनाओं से सत्तासीन पदाधिकारियों को बताया जा सके और पदाधिकारियों को कैसे वार्ता किया जाना है और उनकी सोच क्या है, यह बताया जाये. लेकिन करीब 12 दिन से अधिक का समय हो चुका है, आज तक रिक्वीजिशन मीटिंग नहीं बुलायी गयी है. अलबत्ता जिन कमेटी मेंबरों ने वेज रिवीजन के मुद्दे पर रिक्वीजिशन मीटिंग बुलाने का आवेदन दिया है या यूनियन पर दबाव बना रहे है, उन कमेटी मेंबरों को ही प्रबंधन के मार्फत (अखबारों में खबरें बनवाकर) ही धमकाया जा रहा है. खास तौर पर एनएस ग्रेड के कर्मचारियों को ही धमकाया जा रहा है या एक्शन का भय दिखाया जा रहा है कि अगर वे लोग इस तरह की आवाज उठायेंगे तो उन पर कार्रवाई हो सकती है. वैसे आपको बता दें कि टाटा वर्कर्स यूनियन में महामंत्री को ही रिक्वीजिशन मीटिंग बुलाने का अधिकार है. यूनियन के संविधान और यूनियन के क्रियाक्लाप के लिए जिम्मेदार अधिकारी महामंत्री ही होते है, लेकिन महामंत्री सतीश सिंह ने भी इस मुद्दे पर चुप्पी साध ली है, जिसको लेकर कर्मचारियों और कमेटी मेंबरों में असंतोष है. रिक्वीजिशन मीटिंग बुलाना कमेटी मेंबरों का अधिकार है. अगर कंपनी के कर्मचारी कमेटी मेंबर के पास या यूनियन अधिकारियों के पास या कमेटी मेंबर यूनियन में अपनी बातों को नहीं उठायेगा तो फिर कहां उठायेगा. एक सही मंच यूनियन ही है और वहीं पर आवाज दबाने की कोशिशें तेज हो रही है, जो आने वाले भविष्य के लिए खतरे की घंटी है.



