
चाईबासा : कोरोना संकट काल में घर लौटे प्रवासी मजदूरों को गांव में ही रोजगार देने के लिए कुछ दिन पूर्व ही झारखंड सरकार ने बिरसा हरित ग्राम योजना की शुरुआत की थी। इसे मनरेगा के तहत क्रियान्वित किये जाने का प्रावधान है। इस योजना के तहत सरकार की तरफ से गांव-गांव में लाभुकों को ढूंढ कर उनकी जमीन पर आम के पौधे लगाने हैं। गांव-गांव में लाभुकों के चयन के बाद उसकी जमीन पर पौधारोपण के लिए गड्ढे खोदने की प्रक्रिया युद्धस्तर पर शुरू कर दी गई है। जिले के बहुत सारे गांवों में खुदाई का कार्य पूर्ण हो चुका है। लेकिन उसमें काम करनेवाले मजदूरों को अब तक मजदूरी ही नहीं दी गई है। तीन फीट गहरा और तीन-तीन फीट लंबाई व चौड़ाई वाले दो गड्ढे खोदने पर 194 रूपये मजदूर को देना है। लेकिन मजदूरों ने जी तोड़ मेहनत के बाद बेहद कम समय में ही गड्ढे खोद कर तैयार कर दे रहे हैं। लेकिन उनको समय पर मजदूरी ही नहीं मिल रही है। जबकि प्रखंड कार्यालय की ओर से उनको कहा गया था कि प्रत्येक दो सप्ताह में मजदूरी का भुगतान कर दिया जाएगा। कुछ मजदूरों को तो एक बार भी मजदूरी नहीं मिली है। अब वे मजदूरी की प्रतीक्षा में घर में बैठे हुए हैं।

मजदूरों का स्पष्ट कहना है कि मनरेगा में पहले भी मजदूरी भुगतान में ऐसी ही लेटलतीफी होती थी। आज भी यही हालत है। पूरे जिलेभर में अधिकांश जगहों पर समय पर मजदूरी भुगतान लंबित है। लाभुकों का यह भी कहना है कि मजदूरी भुगतान में देरी की वजह से मजदूर अब उनको निशाना बना रहे हैं। इतना ही नहीं कार्यस्थल पर मजदूरों के लिए ना तो शेड की व्यवस्था है और ना ही पेयजल व प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था है। जबकि मनरेगा के तहत ऐसी व्यवस्था का नियम है। लाभुकों ने यह भी बताया कि अभी तक वृक्षारोपण नहीं होने के कारण बारिश की वजह से गड्ढे धंस रहे हैं। उसमें मिट्टी भर जा रहा है। इस ओर किसी का ध्यान नहीं है। इंजीनियर कार्यस्थल पर आ ही नहीं रहा है। गड्ढों की खुदाई में मापदंडों का पालन भी नहीं हो रहा है।






