नई दिल्ली : वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआइ लेनदेन पर प्रस्तावित मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) को लेकर विपक्ष की आलोचना को खारिज करते हुए कहा कि यह न तो कर है, न उप कर और न ही अधिभार. उन्होंने कहा कि इससे मिलने वाला एक भी पैसा सरकार को नहीं मिलेगा और न ही इसका कोई उपभोक्ताओं पर बोझ पड़ेगा. सीतारमण ने कहा कि एमडीआर डिजिटल भुगतान व्यवस्था के भीतर लगाया जाने वाला शुल्क है और इसे यूपीआइ लेनदेन की सुविधा देने वाले भुगतान सेवा प्रदाता, व्यापारी का बैंक तथा इस व्यवस्था से जुड़े अन्य भागीदार लेते हैं. एनपीसीआइ ने 15 अक्टूबर से कारोबारियों को किए जाने वाले 2,000 रुपये से अधिक के यूपीआइ भुगतान पर 0.4 प्रतिशत एमडीआर लगाया गया है. वहीं, 75,000 रुपये या इससे अधिक के भुगतान पर यह शुल्क अधिकतम 300 रुपये होगा. व्यक्ति-से-व्यक्ति लेनदेन और छोटे भुगतान को शुल्क से बाहर रखा गया है. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा, ‘यह कर नहीं है, यह उपकर नहीं है और न ही अधिभार है. इससे मिलने वाली राशि भारत की संचित निधि में नहीं जाएगी.’ वित्त मंत्री ने कहा कि इससे प्राप्त राशि यूपीआइ से जुड़े बैंकों और अन्य संस्थाओं के बीच बांटी जाएगी. सूत्रों ने कहा कि कुल एमडीआर में से 40 प्रतिशत राशि ग्राहक के बैंक, 30 प्रतिशत भुगतान सेवा प्रदाता, 20 प्रतिशत यूपीआइ ऐप और शेष 10 प्रतिशत राशि यूपीआइ ऐप के प्रायोजक बैंक को मिलेगी. (नीचे भी पढ़ें)
वित्त मंत्री ने कहा कि एमडीआर का बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा और इसका भुगतान व्यापारी भुगतान व्यवस्था के भीतर ही किया जाएगा. सीतारमण ने कहा कि शुल्क को भुगतान व्यवस्था से जुड़े भागीदारों के बीच बांटा जाएगा, जिससे प्रौद्योगिकी ढांचे को बनाए रखने तथा डिजिटल भुगतान में सुधार और नवोन्मेष को बढ़ावा देने में मदद मिलेगी. (नीचे भी पढ़ें)
उन्होंने कहा, ‘इसका सरकार से बिल्कुल कोई लेना-देना नहीं है.’ उन्होंने कहा कि एमडीआर व्यवस्था में एनपीसीआइ व्यापारी, बैंक और अन्य सेवा प्रदाता शामिल हैं. वित्त मंत्री ने यह भी कहा कि व्यापारी पहले से ही क्रेडिट और डेबिट कार्ड से किए गए लेनदेन पर एमडीआर का भुगतान करते हैं. इसलिए नई व्यवस्था को उपभोक्ताओं पर लगाए जाने वाले शुल्क के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए.




