जमशेदपुर : शुक्रवार को एनसीएलएटी के जुडिशियल सदस्य रोहित कपूर और तकनीकी सदस्य बलराज जोशी की एनसीएलटी बेंच में रिजोल्यूशन प्रोफेशनल और टायो के निलम्बित निदेशकों द्वारा मजदूरों के पीएफ का भुगतान नहीं करने के मामले में मजदूरों द्वारा दायर अवमानना और कार्यान्वयन पिटीशन पर सुनवाई हुई. ज्ञातव्य है कि एडजुडिकेटिंग अथॉरिटी ने फरवरी 2021 और एनसीएलएटी ने अप्रैल 2021 में रिजोल्यूशन प्रोफेशनल और टायो के निलम्बित निदेशकों को मजदूरों के पीएफ का अविलंब भुगतान करने को कहा था लेकिन रिजोल्यूशन प्रोफेशनल और टायो के निलम्बित निदेशकों ने मजदूरों के पीएफ का आज तक भुगतान नहीं किया है. (नीचे भी पढ़ें)
मजदूरों के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने बेच को बताया कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल ने मजदूरों को कहा है कि वे मजदूरों का पीएफ का पैसा टाटा के ट्रस्ट के नियमों का अनुसार देंगे जबकि जेट एयरवेज के मामले में एनसीएलएटी ने यह साफ साफ कहा है कि मजदूरों का पीएफ, ग्रेच्युटी और पेंशन का पैसा आईबीसी की धारा 36 के तहत टायो कंपनी की परिसमापन संपत्ति नहीं है. अतः आईबीसी की धारा 18 के तहत रिजोल्यूशन प्रोफेशनल उन पैसों को अपने नियंत्रण में नहीं ले सकता. अधिवक्ता ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय ने एनसीएलएटी के उक्त आदेश के खिलाफ एसएलपी निरस्त कर चुकी है. अतः टायो मैनेजमेंट और रिजोल्यूशन प्रोफेशनल दोनों ने मजदूरों के पैसों को हपड़ कर गैरकानूनी तरीके से उसे अपने नियंत्रण में रखा है. दोनों पक्षों को सुनने के बाद बेंच ने फैसला सुरक्षित रख लिया. ज्ञातव्य यह भी है कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल अपनी नियुक्ति के तुरंत बाद टाटा स्टील के एजेंट के तौर पर काम करना शुरू किया और रिजोल्यूशन प्रक्रिया का न केवल सत्यानाश कर दिया बल्कि टायो के निलम्बित निदेशकों के साथ मिलकर मजदूरों को धमकाना शुरू किया कि अगर मजदूर अपना पिटीशन वापस ले लें और टाटा स्टील को टायो की 350 एकड़ जमीन पर कब्जा करने दें तो वे मजदूरों के पीएफ का भुगतान करेंगे. (नीचे भी पढ़ें)
इसके बाद मजदूरों के अधिवक्ता ने देनदारों की समिति से झारखंड बिजली को बाहर निकालने और मजदूरों को अधिकतम वोटिंग अधिकार दिये जाने की मांग पर दायर याचिका पर बहस की शुरुआत करते हुए कहा कि माननीय बेंच ने मोरेटोरियम आदेश पारित करते समय मजदूरों के 24 करोड़ रूपये की लेनदारी मंजूर की थी जिसे पहले रिजोल्युशन प्रोफेशनल ने घटाकर 20 करोड़ कर दिया और वोटिंग अधिकार 32 फीसदी तय किया जबकि झारखंड बिजली को 72 फीसदी वोटिंग अधिकार दिये. नये रिजोल्यूशन प्रोफेशनल अनीस अग्रवाल ने उससे बड़ा फर्जीवाड़ा करते हुए झारखंड बिजली का वोटिंग अधिकार 90 फीसदी कर दिया और मजदूरों का 7 फीसदी और इस तरह मजदूरों को टायो के रिजोल्यूशन प्रक्रिया से टाटा का हित साधने के लिए बाहर कर दिया. उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 15 अप्रैल 2009 के आदेश का हवाला देते हुए कहा कि सर्वोच्च न्यायालय के उक्त आदेश के चलते झारखंड बिजली की देनदारी का डिफाल्ट 2009 में हुआ है जो तीन साल के बाद आईबीसी के धारा 238ए के तहत परिसीमा वर्जित है. अतः 5 अप्रैल 2019 को जब मोराटोरियम आदेश पारित हुआ उस दिन झारखंड बिजली की कोई लेनदारी नहीं थी. अतः झारखंड बिजली को लेनदारों की समिति से बाहर निकाला जाये. उन्होंने कहा कि यह आईबीबीआई के दिशा निर्देशों के तहत भी सही है. (नीचे भी पढ़ें)
समयाभाव के चलते इस और टायो की जमीन के मामले सहित अन्य पिटीशनों पर सुनवाई पूरी नहीं हो सकी. अगली सुनवाई 23 मार्च 2023 को मुकर्रर की गयी है जिस दिन मजदूरों के लिए अधिवक्ता अपनी जिरह पूरी करेंगे. ज्ञातव्य है कि जमीन के मामले में मजदूरों द्वारा दायर आवेदन के खिलाफ दायर अपने हलफनामे में रिजोल्यूशन प्रोफेशनल ने कहा है कि टायो की 350 एकड़ जमीन में से 300 एकड़ टाटा स्टील की है और सिर्फ 50 एकड़ जमीन टायो की है. इससे स्पष्ट है कि टाटा स्टील अपने कुत्सित इरादे के तहत जब कानूनी तौर पर टायो की 350 एकड़ जमीन पर कब्जा नहीं कर सकी तब उसने पहले रिजोल्यूशन प्रोफेशनल विनीता अग्रवाल को अपने पक्ष में किया और विनीता अग्रवाल को मजदूरों द्वारा हटाने के बाद नये रिजोल्यूशन प्रोफेशनल अनीश अग्रवाल को क्विड प्रो क्वो यानी ‘कुछ के लिए कुछ’ (यह एक ऐसी स्थिति की व्याख्या करता है जब दो पक्ष वस्तुओं या सेवाओं के परस्पर आदान प्रदान के लिए एक आपसी समझौता करते हैं) के आधार पर अपने पक्ष में कर लिया और रिजोल्यूशन प्रोफेशनल से यह फर्जी हलफनामा दायर करवाया है. (नीचे भी पढ़ें)
सुनवाई के दौरान मजदूरों के अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव ने बेंच को बताया कि अब तक 190 कामगारों के आवेदन में से सिर्फ 15 कामगारों का भुगतान किया गया है और बाकी को गैरवाजिब तरीके से टाल-मटोल की रणनीति द्वारा उनके भविष्य निधि राशि के भुगतान को रोक दिया गया है. ज्ञातव्य है कि रिजोल्यूशन प्रोफेशनल को पीएफ का भुगतान करने के बाद भी टायो के निलम्बित निदेशकों ने अनाधिकार मजदूरों को आवेदन पत्र देने, वेबसाइट पर लोगिन करने जैसे फर्जी आदेश दिये जो मजदूर नहीं कर सके. उन आवेदनों में निलम्बित निदेशकों ने कर्मचारियों से आवेदन के अंतिम पारा में हैरान करने वाली उद्घोषणा लिखवायी कि ‘मैं घोषणा करता हूं की मैं 2016 अक्टूबर से बेरोजगार हैं. मजदूरों की तरफ से अधिवक्ता अखिलेश श्रीवास्तव और चार्टर्ड अकाउंटेंट रमेश कुशवाहा ने जिरह किया.



