जमशेदपुर: पूर्वी सिंहभूम जिला के डुमरिया प्रखंड के लखाइडीह के ग्राम प्रधान कान्हू राम टुडू ने नई दिल्ली में आयुर्वेद एवं हर्बल खेती के क्षेत्र में कार्यरत प्रतिष्ठित विशेषज्ञों और उद्यमियों के साथ एक महत्वपूर्ण बैठक की. इस संवाद का मुख्य उद्देश्य झारखंड, ओडिशा एवं पश्चिम बंगाल के सीमावर्ती आदिवासी बहुल क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध बहुमूल्य जड़ी-बूटियों की संभावनाओं को राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाना था.बैठक के दौरान प्रधान कान्हू राम टुडू ने स्पष्ट रूप से कहा कि जिस प्रकार अन्य राज्यों में “हर्बल क्रांति” ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को नई दिशा दी है, उसी प्रकार झारखंड भी प्राकृतिक संपदाओं के बल पर आत्मनिर्भरता की मिसाल बन सकता है. उन्होंने बताया कि एक समय नक्सल प्रभावित “रेड जोन” के रूप में पहचाना जाने वाला यह इलाका आज पूरी तरह नक्सल मुक्त है और विकास के नए अवसरों के लिए तैयार है.(नीचे भी पढ़े)
उन्होंने जोर देते हुए कहा कि इस क्षेत्र में प्राकृतिक संसाधनों की कोई कमी नहीं है. यदि योजनाबद्ध तरीके से हर्बल खेती, प्रसंस्करण एवं विपणन की व्यवस्था विकसित की जाए, तो यहां के आदिवासी और मूलवासी समुदायों के लिए बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित किया जा सकता है. इससे न केवल आर्थिक सशक्तिकरण होगा, बल्कि पलायन पर भी रोक लगेगी.इस अवसर पर डॉ. कर्ण राजहंस, जो आयुर्वेद श्री हर्बल प्राइवेट इंडिया लिमिटेड के प्रबंध निदेशक (एमडी) हैं, ने भी अपनी सहमति और रुचि व्यक्त की. डॉ. राजहंस ने गुजरात, हिमाचल प्रदेश तथा असम सहित कई राज्यों में आयुर्वेद एवं हर्बल उद्योग के क्षेत्र में सफल कार्य किए हैं. (नीचे भी पढ़े)

प्रधान कान्हू राम टुडू ने डॉ. राजहंस एवं हर्बल उत्पादों के आयात-निर्यात से जुड़े व्यवसायियों से लखाइडीह और आसपास के सीमावर्ती क्षेत्रों का दौरा करने का आग्रह किया, ताकि जमीनी स्तर पर संभावनाओं का आकलन कर ठोस कार्ययोजना तैयार की जा सके. इस बैठक में, दिनेश जैन, जितेंद्र सख्या, संतोष कुमार सरस, इंदर जीत सेहरावत, भैरव महाराज सहित अन्य गणमान्य व्यक्ति भी उपस्थित थे.यह पहल न केवल झारखंड में हर्बल उद्योग की नई शुरुआत का संकेत है, बल्कि यह आदिवासी क्षेत्रों के समग्र विकास, आत्मनिर्भरता और हरित अर्थव्यवस्था की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकती है.







