जमशेदपुर : जमशेदपुर के तुलसी भवन में सोमवार को सिंहभूम जिला हिंदी साहित्य सम्मेलन की ओर से वार्षिक विचार सत्र का आयोजन हुआ. इसमें राज्यसभा के सदस्य सह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रखर विचारक प्रो राकेश सिन्हा ने भारत की उन्नत ज्ञान परंपरा पर अपने विचार रखते हुए भारतीय इतिहास के संदर्भ में किये जा रहे अनेक बदलावों के औचित्य एवं उनकी उपादेयता स्थापित करने की कोशिश की. (नीचे भी पढ़ें)

प्रो राकेश सिन्हा ने कांग्रेस के शासन काल में भारतीय इतिहास को चयनित रूप में प्रस्तुत किये जाने का आरोप लगाते हुए कहा कि उस इतिहास में मुगल काल को ही भारत का असली इतिहास बताया गया, जो देश के साथ क्रूरता है. उन्होंने कहा कि इसके मद्देनजर उसमें बदलाव आवश्यक था. उन्होंने कहा कि भारतीय इतिहास का फलक और बढ़ाया जाना जरूरी है जिसमें प्राचीन भारत की उपलब्धियां भी उसमें समाहित हों.(नीचे भी पढ़ें)
इसी तरह देश के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को भी कुछ खास लोगों का महिमामंडन करने वाला बताते हुए कहा कि इसमें राष्ट्र को प्रेरित करने वाले प्रसंगों को दरकिनार कर दिया गया. इस संदर्भ में उन्होंने देश के स्वतंत्रता संग्राम में अपना सर्वस्व न्योछावर कर देने वाले वीर शहीदों का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया कि कैसे उनकी शहादत को जान-बूझकर उसमें समाहित नहीं किया गया. उन्होंने कहा कि हमारी इतिहास की पुस्तकें गुरु तेग़ बहादुर की शहादत पर मौन हैं और तुष्टिकरण की नीति के तहत गुरु गोविंद सिंह के नाबालिग बच्चों की शहादत की भी उपेक्षा करता है.(नीचे भी पढ़ें)
प्रो सिन्हा ने कहा कि अब तक की औपनिवेशिक मानकीकरण की नीति को भारतीय ज्ञान परंपरा ही समाप्त करने में कामयाब होगी. उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने औपनिवेशिक संरचना को हटाकर राष्ट्र की अस्मिता को समृद्ध करने पर अधिक जोर दिया है. उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परम्परा चुम्बक की तरह है, जबकि पश्चिमी ज्ञान तीखे हथियार की तरह. पश्चिम आधिपत्य के जरिये अपने ज्ञान को प्रसरित करने की कोशिश करता है जबकि भारतीय अपनी ज्ञान परंपरा के दर्शन एवं जीवन मूल्यों के द्वारा प्रसरण में विश्वास रखते हैं.(नीचे भी पढ़ें)
तुलसी भवन के न्यासी अरुण कुमार तिवारी की अध्यक्षता में आयोजित विचार सत्र में इंद्रदेव प्रसाद ने आगत अतिथियों का स्वागत किया जबकि विचार सत्र के संयोजक विद्यासागर लाभ के धन्यवाद ज्ञापन के साथ सत्र संपन्न हुआ.



