
जमशेदपुर : झारखंड विधानसभा द्वारा बुधवार को “सरना आदिवासी धर्म कोड” का प्रस्ताव पारित होने का मामला अभी ठंडा नहीं हो रहा है. आदिवासियों के नेता और आदिवासी सेंगल अभियान चलाने वाले जनता दल यूनाइटेड के प्रदेश अध्यक्ष पूर्व सांसद सालखन मुर्मू ने सरना धर्म कोड के नाम को बदलकर सरना आदिवासी धर्म कोड करने पर गहरी आपत्ति जतायी है. उन्होंने कहा है कि सरना आदिवासी धर्म कोड विधानसभा से पारित होना जरूर एक घटना है. मगर जनभावना के अनुरूप नहीं है. जनता की मांग “सरना धर्म कोड” की थी. वृहद झारखंड और झारखंडी आदिवासी केवल सरना धर्म कोड के नाम से ही आंदोलन करते रहे हैं. आदिवासी धर्म कोड के नाम से नहीं. अभी विश्व आदिवासी दिवस 9 अगस्त 2020 को भी डॉ रामेश्वर उरांव , झारखंड कांग्रेस अध्यक्ष और मंत्री ने सरना धर्म कोड को सितंबर 18 से 22 नवंबर के झारखंड मानसून सत्र में लाने की घोषणा कर चुके थे. हेमंत सोरेन ने दुमका और बेरमो उपचुनाव को प्रभावित करने के उद्देश्य से भी सरना धर्म कोड के प्रस्ताव को 15 नवंबर 2020 के पूर्व विशेष विधानसभा सत्र बुलाकर पारित करने की बात कही थी तो अचानक आदिवासी धर्म कोड कहां से आ गया और किसके लिए आ गया ? चूंकि 50 लाख झारखंडी आदिवासी तो 2011 की जनगणना में सरना धर्म लिखाया था और केवल 41000 लोगों ने आदिवासी धर्म लिखाया था. तब क्यों हेमंत सोरेन सरकार द्वारा अचानक ईसाई आदिवासियों को बचाने के किसी साजिश के तहत आदिवासी धर्म कोड को शामिल किया गया है. सालखन मुर्मू ने आरोप लगाया है कि इसके पीछे मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रधान सचिव राजीव अरुण एक्का आइएएस जो खुद एक ईसाई हैं, और ईसाई धर्म गुरुओं का हाथ हो सकता है. आदिवासी सेंगेल अभियान, अभी भी केवल सरना धर्म कोड की मांग करता है इसलिए भारत सरकार से हमारी मांग है की अविलंब झारखंडी आदिवासियों को धार्मिक पहचान के रूप में केवल सरना धर्म कोड के लिए अगला 7 नंबर दे दिया जाए. जाति और धर्म का खिचड़ी पकाने के पीछे केवल वोट बैंक का स्वार्थ है. हेमंत सोरेन ने खिचड़ी पका लिया था. मगर विधानसभा मे भाजपा के विधायक नीलकंठ सिंह मुंडा के प्रयास से हेमंत सोरेन की साजिश विफल हुई है. झारखंड विधानसभा में पारित “सरना आदिवासी धर्म कोड” के पारित प्रस्तावना से भी दिल्ली बहुत दूर है क्योंकि पहले भी लिंगायत धर्म को कांग्रेस पार्टी ने 23 मार्च 2018 को कर्नाटक विधानसभा में पारित कराने के बावजूद भाजपा की केंद्र सरकार ने उसको मान्यता नहीं दी थी. अतः जब तक भारत सरकार सरना धर्म कोड को मान्यता नहीं देती है, हमें कठिन सफर मंजिल तक के लिए तैयार रहना पड़ेगा. अतः बेवजह ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं है. अतएव भारत के 5 प्रदेशों- झारखंड, बंगाल, बिहार, उड़ीसा और असम में आदिवासी सेंगेल अभियान और केंद्रीय सरना समिति, रांची और अखिल भारतीय आदिवासी विकास परिषद, रांची के द्वारा 15 नवंबर से एक सप्ताह के सघन जनजागरण लिए कम से कम 50 सरना धर्म सगाड़ (रथ) चलाने का निश्चय हुआ है ताकि यदि 30 नवंबर 2020 तक हमें हमारा 2021 की जनगणना के लिए सरना धर्म कोड नहीं मिलता है तो 6 दिसंबर 2020 को राष्ट्रव्यापी रेल-रोड चक्का जाम को सफल बना सकेंगे. 13 नवंबर को बलरामपुर के पास बसिटनडी ( पुरुलिया ज़िला, बंगाल) और रायरंगपुर, मयूरभंज, ओडिशा में सरना धर्म कोड के लिये दो बड़ी जनसभाओं का आयोजन है। बंगाल की सभा को सालखन मुर्मू और सुमित्रा मुर्मु संबोधित करेंगे.







