
जमशेदपुर : टाटा स्टील एडवेंचर फाउंडेशन ने ट्रिपल पास चैलेंज सफलतापूर्वक पूरा किया है. भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ है. यह अभियान 09 अक्टूबर से शुरू हुआ और 29 अक्टूबर 2020 को समाप्त हुआ. यह अभियान तीन चोटियों और तीन सप्ताह तक चला. आम तौर पर, ट्रेकर्स सिंगल पास पूरा करते हैं, लेकिन एक ही बार में तीन सबसे ऊंचे मार्गों के लिए अभियान का आयोजन पहली बार किया गया. नीचे अभियान के विभिन्न पहलुओं से संबंधित विवरण दिए गए हैं. टीएसएएफ की टीम के अलावा कुल 11 प्रतिभागी इस अभियान का हिस्सा थे. दरवा पास (13,500 फीट), बाली पास (16200 फीट), बोरसु पास (17300 फीट) पर अभियान उत्तराखंड से शुरू हुआ और हिमाचल प्रदेश में समाप्त हुआ. अभियान अक्टूबर में आयोजित किया गया था. अक्टूबर के मध्य तक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में हिमपात शुरू हो जाता है, टीम ने ट्रेक पर न्यूनतम 12 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान का सामना किया. चट्टानें, खुले खंड, नदी, नाले, ग्लेशियर और दर्रे के बीच टीम खुद पर निर्भर थी. इस टीम में 4 एवरेस्टर्स बछेंद्री पाल, हेमंत गुप्ता, आरएस पाल, पूनम और उच्च स्तर के अनुभवी इंस्ट्रक्टर्स मोहन रावत, धर्मेंद्र और रणदेव शामिल थे. कोविड–19 को देखते हुए सुरक्षा उपाय के बीच अभियान में शामिल होने से पहले सभी प्रतिभागियों का परीक्षण किया गया और अभियान के दौरान सभी मानक सरकारी दिशा-निर्देशों का पालन किया गया. (नीचे पढ़े क्या है अभियान, कैसे रहा अभियान)
क्या है यह अभियान जानें :
ट्रिपल पास – प्रतिभागी भारत के विभिन्न हिस्सों आए हैं। आईआईएम इंदौर के एक प्रोफेसर कमल, अहमदाबाद से मालव, पुणे से अमोल, बैंगलोर से प्रिया, जयपुर से अनुराग।
डबल पास – बाली और बोरसु पास – सीमा टोलिया, अनिता वैद्य
ॠसगल पास – निर्मल पांडे, मनीष, सोमनाथ, प्रणव महाजन
काफलोन में 1–दिवसीय र‚क क्लाइॠम्बग, रैपॠलग और रिवर क्र‚ॠसग।
चरण –(12–16 अक्टूबर) दरवा पास– उत्तरकाशी में संगमचट्टी से अभियान शुरू हुआ. पाइन और रोडोडेंड्रोन के घने जंगल के बीच से होकर गुजरता है. डोडीताल – रास्ते में रहस्यमयी झील। (14 अक्टूबर) दरवा पास को पार करने के बाद ‘सीमा’ तक ट्रेक हराभरा मैदान है. हनुमान चट्टी तक सीधी खड़ी चढ़ाई. (17 अक्टूबर – 22 अक्टूबर) बाली पास या दर्रा – दरवा पास को पार करने के बाद टीम खुश थी, लेकिन थकी हुई थी और आराम करने का समय नहलृ था. तैयारी शुरू और अगले चुनौतीपूर्ण बाली पास पर चढ़ने के लिए तैयारी भारु. बाली पास के लिए ट्रेक जानकी चट्टी से शुरू होता है –यह रास्ता यमुनोत्री (प्रसिद्ध तीर्थस्थल) की ओर भी जाता है. जानकी चट्टी से लोअर दामानी के लिए खड़ी चढ़ाई. अगले दिन रास्ते में कुछ खुले खंड (एक्सपोज्ड सेक्भान) के साथ बाली पास बेस (14400 फीट) के लिए ट्रेक वास्तव में चुनौतीपूर्ण था. टीएसएएफ टीम ने प्रत्येक सदस्य को सफलतापूर्वक सेक्भान पार करने में मदद की. बाली पास को पार करने के लिए टीम उत्साह के साथ अगले दिन जल्दी उठ गई. हिमोढ़ और खड़ी चट्टानी खंडों को पार करने के बाद टीम 20 अक्टूबर को सुबह 11:30 बजे के करीब बाली पास पहुंची. दूसरे पास तक पहुंचने पर हर कोई बहुत खुश था. बाली पास से उतरते समय, टीम ने ग्लेशियर और ओडारी (14000 फीट) तक एकदम खुले रिज को पार किया. अगली सुबह ओडारी अभियान की सबसे ठंडी रात थी. ‘सीमा’ के रास्ते में टीम ने रुइंसियारा ताल का दौरा किया. (23 अक्टूबर –28) अक्टूबर) बोरसु पास – दो पास पार किया गया। ओसला के पास टीम का विश्राम दिवस था. लेकिन अभियान अभी खत्म नहीं हुआ था. टीम को पता नहलृ था कि अंतिम पास ‘बोरसु पास’ के रूप में अभी सबसे बड़ी चुनौती आने वाली है, जो शायद ही कभी पार किया हो. इसके बारे में पहले से बहुत कम जानकारी उपलब्ध है. रास्ते का पहला पड़ाव था ‘हर की दुन’– शिव की घाटी. अगले दिन नदी के किनारे धीरे–धीरे आगे बढ़ा गया और टीम ने नदी के पास डेरा डाला. बोरसु पास का बेस 14000 फीट पर था. आखिरकार सबसे मुश्किल दिन आ गया. सुबह 6 बजे नाश्ता करने के बाद, टीम ने बोरसु पास को पार करने के लिए अभियान शुरू किया. रास्ते में खुले चट्टानी रिज और इसके बाद क्रेवास मैदान थे. क्रेवास क्षेत्र को नेविगेट करने में समय लगता था. धीरे–धीरे लक्ष्य के करीब पहुंचते हुए, आखिरी बाधा बर्ग्सच्रुंड और पास की ओर अंतिम फिसलन भरी चढ़ाई थी. अंत में, दोपहर लगभग 2:30 बजे, 27 अक्टूबर को टीम बोरसु पास पर थी. सभी भावाविभोर थे. यह सभी के लिए भावुक पल था. आपस में गले मिलने, मिठाइयाँ खाने–खिलाने तथा फोटो खींचने के बाद टीम ने शानदार डाउनहिल यात्रा की शुरुआत की. लेकिन मुभिकलें अभी खत्म नहीं हुई थी. 12 घंटे की थकावट भरे दिन के बाद टीम को हिमोढ़ यानी मोराइन की चट्टानों पर हड्डियों को जमा देने वाली ठंडी रात बितानी पड़ी. अंतिम दिन नीचे की यात्रा, विभोशकर अंतहीन मोराइन क्षेत्र को पार करना भी मुश्किलों भरा साबित हुआ..सूरज ढलने के बाद भी टीम चल रही थी. अंत में, उन्होंने चितकुल के पास एक परित्यक्त आईटीबीपी शिविर में डेरा डाला. अगले दिन सब कुछ पैक करने के बाद टीम गंतव्य स्थल – चितकुल पहुँची. इस उपलब्धि को हासिल करने के बाद टीम बहुत खुश थी, जैसे वो चाँद पर हों. लगभग तीन सप्ताह वे घर की आरामदेह विलासिता से दूर रहे. अंत में, उन्हें मोबाइल नेटवर्क भी मिल गया और उन्होंने अपनी तस्वीरों को अपलोड करना शुरू किया तथा परिवार व दोस्तों के साथ अभियान की मीठी यादें साझा कल.








