गुड़ाबांदा : पूर्व नक्सली कान्हू मुंडा ने जेल से रिहा होकर अपने घर पहुंचने पर शार्प भारत न्यूज पोर्टल के प्रतिनिधि से बातचीत की. इस दौरान उन्होंने अपने नक्सली संगठन से जुड़ने से लेकर सरेंडर करने और उसके बाद जेल में बिताए दिनों की सारी बातें बड़ी बेबाकी से बताईं. नक्सली संगठन से जुड़ने के कारणों के बारे में पूछने पर कान्हू मुंडा ने बताया कि क्षेत्र में हो रहे शोषण और अत्याचार के विरोध में वे 1998 में नक्सलवाद से जुड़े और 16-17 साल तक नक्सली संगठन से जुड़े रहे. फिर झारखंड सरकार की नक्सली पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उन्होंने 15 फरवरी 2017 को अपने कुछ साथियों के साथ पुलिस के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया. कान्हू मुंडा ने बताया कि करीब 9 साल 7 माह जेल में सजा काटने के पश्चात विगत 11 सितंबर (2026) को अपने घर गुड़ाबांदा प्रखंड के जियान गांव के बनगोड़ा टोला लौटे. उन्होंने बताया कि वे पुलिस की प्रताड़ना और शोषण से त्रस्त होकर नक्सली संगठन से जुड़े. उन्होंने बताया कि संगठन से जुड़ने से पूर्व गुड़ाबांदा थाना की पुलिस उन्हें एक हत्या के मामले में पकड़कर थाने ले गई थी जहां उन्हें काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी. इससे उनके मन में व्यवस्था के विरुद्ध आक्रोश भर गया. वहीं विभाग के पदाधिकारियों और ठेकेदारों द्वारा स्थानीय लोगों और मजदूरों के किये जा रहे शोषण जैसे अन्य कारणों से उनका झुकाव सशस्त्र क्रांति की और हुआ. (नीचे भी पढ़ें)
कान्हू मुंडा पर 72 मामले थे जांच के बाद 37 मामले हटाए गए
पूर्व नक्सली कमांडर सह जोनल सचिव रहे कान्हू मुंडा ने अपने ऊपर चल रहे मुकदमों के संबंध में बताया कि उन पर पश्चिम बंगाल और झारखंड में कुल 72 मामले दर्ज थे. हालांकि सरेंडर करने के बाद जांच के क्रम में 37 मामले खत्म कर दिए गए. उन्होंने कहा कि उन पर अदालत में कुल 35 मामलों में ट्रायल चला, जिनमें से 33 मामलों में वे बरी हो चुके हैं और 2 मामलों में उन्हें जमानत मिली हुई है, जिसके कारण वे रिहा होकर घर लौटे हैं. (नीचे भी पढ़ें)
पुनर्वास नीति का कुछ लाभ मिला, बाकी के लिए मिलेंगे वरीय पदाधिकारियों
कान्हू मुंडा ने बताया कि झारखंड सरकार की नक्सली पुनर्वास नीति का उन्हें लाभ मिला है. इसके तहत उन पर घोषित इनाम 25 लाख रुपए की इनामी राशि और 5 लाख रुपए की प्रोत्साहन राशि मिल चुकी है और भूमि भी उपलव्ध कराई गई है. कुछ लाभ शेष हैं जिनको लेकर वे जल्द ही जिले के वरीय पदाधिकारियों से मिलकर मांग रखेंगे. (नीचे भी पढ़ें)
पहले भी क्षेत्र के लोगों की सेवा की, आगे भी करेंगे
पूर्व नक्सली कान्हू मुंडा ने कहा कि संगठन में रहते हुए भी उन्होंने क्षेत्र के लोगों की सेवा की थी और आगे भी करेंगे. उन्होंने कहा कि अब समय बदल चुका है. सरकार और प्रशासन पहले से बेहतर काम कर रहे हैं. अब उनका माध्यम हथियार या हिंसा नहीं होगा, वे अब लोकतांत्रिक तरीके से जन समस्याओं का समाधान ढूंढ़ेंगे. क्षेत्र की समस्याओं का स्थानीय सांसद, विधायक, स्थानीय पदाधिकारियों एवं मुखिया के समक्ष रखकर उनके समाधान का प्रयास करेंगे. (नीचे भी पढ़ें)
गुड़ाबांदा में पर्यावरण संरक्षण हो, वन संपदा के दोहन पर शिकंजा कसे
गुड़ाबांदा क्षेत्र में नक्सलवाद समाप्त होते ही माफियों के हावी होने के प्रश्न पर कान्हू मुंडा ने कहा कि वे संगठन में रहकर लोगों को पर्यावरण संरक्षण के प्रति जागरूक करते थे. किन्तु आज प्रशासनिक स्तर पर क्षेत्र में जागरूकता अभियान नहीं चलाया जा रहा है, जिससे क्षेत्र में पर्यावरण का विनाश हो रहा है. उन्होंने कहा कि आज क्षेत्र में माफिया हावी हैं. पत्थर माफिया क्षेत्र से सफेद पत्थर तोड़वाकर अवैध व्यापार कर रहे हैं. इसपर रोक लगनी चाहिए. इसके लिए स्थानीय प्रशासन और वन विभाग के पदाधिकारी वन माफियों पर शिकंजा कसें, तभी क्षेत्र में पर्यावरण संरक्षित होगा और खनिज संपदा भी सुरक्षित रहेगी. कान्हू मुंडा ने बताया कि वे 1998 में नक्सलवाद से सेल कमेटी में जुड़े और धीरे-धीरे एक-एक पायदान चढ़ते हुए स्टेट कमेटी तक पहुंचे और संगठन का काम किया. (नीचे भी पढ़ें)
अपने टोले तक आज भी सड़क नहीं पहुंचने पर जताया रोष
कान्हू मुंडा ने बताया कि झारखंड सरकार की नक्सली पुनर्वास नीति के तहत वर्ष 2017 में पुलिस के समक्ष सरेंडर करते समय अधिकारियों ने आश्वस्त किया था कि क्षेत्र में विकास और सड़क निर्माण कराने का वादा किया था जो आज भी अधूरा है. इस पर रोष जताते हुए कान्हू मुंडा ने बताया कि आज भी उनके टोले तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं है. उनके घर में कोई बीमार पड़ जाए तो उसे उपचार के लिए खटिया पर लेटाकर ही सड़क तक ले जाना पड़ेगा. उन्होंने बताया कि उनके टोले में सोलर पानी टंकी लग गई है और कुछ लोगों के अबुआ आवास या पीएम आवास भी बन गए हैं, लेकिन क्षेत्र में अभी बहुत कुछ करना बाकी है. (नीचे भी पढ़ें)
बीए पार्ट वन किया, इंजीनियर बनना चाहते थे
कान्हू मुंडा ने बताया कि उन्होंने मैट्रिक परीक्षा 1987 में आस्ता कोवाली हाई स्कूल से पास कर घाटशिला कॉलेज में दाखिला लिया और वहां बीए पार्ट वन तक पढ़ाई की, लेकिन आर्थिक तंगी के कारण पढ़ाई बीच में छोड़नी पड़ी. उन्होंने कहा कि वे आइटीआइ कर इंजीनियर बनना चाहते थे. चाईबासा आइटीआइ में उनका सेलेक्शन भी हो गया था, परंतु कॉल लेटर काफी देर से मिला. लेटर मिलने के पश्चात वे अपने चाचा के साथ चाईबासा आइटीआइ कॉलेज दाखिला लेने पहुंचे थे तो वहां उन्हें कहा गया कि आने में देर हो गई है, आपके स्थान पर किसी और का दाखिला हो चुका है, आप अगले साल आएं. उन्होंने कहा कि वे तो इंजीनियर बनकर क्षेत्र का विकास करना चाहते थे, परंतु परिस्थितियों ने उनके हाथ से कलम छीन कर हथियार थमा दिया और वे नक्सली संगठन से जुड़ गए. उन्होंने कहा कि उस समय छत्तीसगढ़ से आए माओवादी लीडर श्रीधर की विचारधारा से प्रभावित होकर वे संगठन से जुड़े. (नीचे भी पढ़ें)
झारखंड बनने के बाद सोशल पुलिसिंग ने लोगों को मुख्यधारा से जोड़ा
कान्हू मुंडा ने बताया कि झारखंड राज्य बनने से पूर्व जिस पुलिस प्रशासन के अत्याचार से त्रस्त क्षेत्र के लोग प्रशासन के खिलाफ नक्सलवादी विचारधारा से प्रभावित होकर नक्सली संगठन से जुड़े थे. लेकिन झारखंड अलग राज्य बनने के बाद पुलिस ने अपनी कार्यशैली बदली और सोशल पुलिसिंग के तहत स्कूली बच्चों के बीच पाठ्य पुस्तकें वितरित करने, युवाओं के बीच खेल प्रतियोगिताएं आयोजित कराने समेत अन्य शोसल कार्य कर लोगों को काफी प्रभावित किया. अलग झारखंड राज्य में पुलिस की कार्यशैली बदली और क्षेत्र के लोगों के प्रति पुलिस का रवैया भी बदला. पुलिस में इस बदलाव से प्रभावित होकर लोग भी धीरे-धीरे समझने लगे और मुख्य धारा से जुड़ने लगे. (नीचे भी पढ़ें)
संगठन में रहकर भी किये सेशल वर्क
कान्हू मुंडा ने बताया कि संगठन की ओर से क्षेत्र में काफी शोसल वर्क किए गए. धनकटनी के बाद सब्जी की खेती के लिए क्षेत्र के किसानों में बीज वितरित कया जाता था. फसलों की सिंचाई के लिए कई गांवों मे पंप सेट दिये गए. जहां पेयजल की समस्या थी वहां कुएं भी बनवाए और कुछ सबर परिवारों के टाली की छत वाले घर भी बनवाए थे. संगठन ऐसे कार्यों के लिए सामग्रियां उपलब्ध कराता था और लोग श्रमदान कर काम पूरा करते थे. (नीचे भी पढ़ें)
परिविर में हैं माता-पिता, पत्नी और तीन बच्चे
कान्हू मुंडा ने अपने परिवार के बारे में बताया कि उनके माता-पिता अभी जिंदा हैं. उनकी पत्नी और तीन बच्चे हैं. पत्नी आंगनवाड़ी सेविका हैं. बड़ी बेटी चाईबासा में नौकरी करती है, छोटी बेटी एमएससी कर एवं बेटा ग्रेजुएशन कर कंपिटीटिव परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं. यह पूछे जाने पर कि संगठन में रहने के दौरान परिवार कैसे चला और बच्चों की पढ़ाई कैसे हुई, उन्होंने बताया कि पत्नी को मानदेय मिलता था, दोनों बेटियों को स्कॉलरशिप मिलता था. घर की कुछ खेती भी थी. सब मिलाकर परिवार चला, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई भी हो गई. (नीचे भी पढ़ें)
केस खत्म हों फिर किसी राजनीतिक दल से जुड़कर करेंगे काम
आगे क्या करना है, यह पूछे जाने पर कान्हू मुंडा ने बताया कि आज राजनीति के बिना कुछ नहीं हो सकता. तो किसी न किसी राजनीतिक दल से तो जुड़ना ही होगा. लेकिन अब तक किसी भी दल के किसी ने संपर्क नहीं किया है. उन्होंने कहा कि अभी कुछ केस लंबित हैं, इसलिए किसी भी दल के पक्ष में कुछ नहीं बोल सकते, लेकिन केस खत्म होने के बाद किसी न किसी दल से जुड़ेंगे.




