
देहरादून : झारखंड में जब भाजपा की रघुवर दास की सरकार थी, उस वक्त का पाप अब उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर काफी भारी पड़ रहा है. हालांकि, इस मामले को लेकर उत्तराखंड के नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा सीबीआइ जांच के दिये गये आदेश पर गुरुवार (29 अक्तूबर 2020) की दोपहर में दिये गये एक आदेश में सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. इस मामले को लेकर उत्तराखंड के नैनीताल हाईकोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए पूरे मामले की सीबीआइ जांच के आदेश दिये थे, जिसके खिलाफ उत्तराखंड सरकार और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगायी थी, जिस पर सुनवाई करते हुए उत्तराखंड सरकार, केंद्र सरकार और उससे जुड़े हुए सारे लोगों को नोटिस भी जारी किया है. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)
क्या है झारखंड गौ सेवा आयोग
झारखंड में 2015 में रघुवर दास के नेतृत्व में भाजपा की सरकार बनी थी. उस वक्त भाजपा ने झारखंड प्रदेश का प्रभारी त्रिवेंद्र सिंह रावत को बनाया था, जो अभी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बन चुके है. बताया जाता है कि झारखंड में खाली पड़े गौ सेवा आयोग के अध्यक्ष पद पर आसीन होने के लिए भाजपा किसान मोर्चा के झारखंड के प्रदेश उपाध्यक्ष अमृतेश चौहान ने झारखंड के तत्कालीन प्रभारी और उत्तराखंड के वर्तमान सीएम त्रिवेंद्र सिंह रावत को उत्तराखंड में हुए विधानसभा चुनाव से पहले उनके साढ़ू और उनके परिजनों के 13 बैंक खातों में 25 लाख रुपये जमा कराये थे. यह पैसे जिस दौरान जमा कराये गये थे, उस वक्त देश के प्रधानमंत्री और भाजपा का चेहरा बन चुके नरेंद्र मोदी ने नोटबंदी लागू कर दी थी और 500 और 1000 रुपये के नोट को बंद कर दिया था. एक खाते में दो लाख रुपये से ज्यादा की रकम जमा करने पर रोक लगा दी गयी थी. बताया जाता है कि अमृतेश चौहान द्वारा उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत को दिये गये पैसे को पुराने नोटों में ही जमा कराया गया था. एक तरफ भ्रष्टाचार को रोकने के लिए नोटबंदी की गयी थी तो दूसरी तरफ उनके ही भाजपा के नेता नोटबंदी में 25 लाख रुपये घूस की रकम एकाउंट में मंगवा रहे थे. बताया जाता है कि भाजपा किसान मोर्चा के प्रदेश उपाध्यक्ष रहे अमृतेश सिंह चौहान को झारखंड गौ सेवा आयोग का अध्यक्ष बनाने के लिए उत्तराखंड के वर्तमान मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के मोबाइल नंबर पर बातचीत हुई और उन्हें यह भी बताया गया कि उन्होंने अब तक 25 लाख रुपये उन्हीं खातों में जमा करा दिये है, जिनके खाता नंबर उसे दिये गये थे और जिन खातों में पैसा जमा कराया गया था, उसकी रसीद भी झारखंड के भाजपा प्रभारी रहे त्रिवेंद्र सिंह रावत के नंबर पर वाट्सएप के जरिये भेजी गयी थी. इस बीच भाजपा की सरकार उत्तराखंड में भी बन गयी और त्रिवेंद्र सिंह रावत मुख्यमंत्री बन गये. बताया जाता है कि अमृतेश चौहान को जब गौ सेवा आयोग का अध्यक्ष नहीं बनाया गया तो उसने त्रिवेंद्र सिंह रावत से संपर्क भी साधा, लेकिन कोई ठोस जवाब नहीं मिला. इसके बाद अमृतेश ने कुछ पत्रकारों से संपर्क साधा और बताया कि उसने मुख्यमंत्री को 25 लाख रुपये दिये है, लेकिन अब पैसे नहीं लौटा रहे है और गौ सेवा आयोग का अध्यक्ष भी नहीं बनाया है. पत्रकारों को अमृतेश ने त्रिवेंद्र सिंह रावत से वाट्सएप पर हुई बातचीत और खातों में जो पैसे भेजे गये थे, उसकी रशीद को भेजा गया है. अमृतेश ने मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत से हुई बातचीत, पैसे का सारा ब्योरा भी पत्रकारों को उपलब्ध कराया, जिसके बाद सरकार के करीबी लोग सक्रिय हुए और अमृतेश चौहान को दिल्ली बुलाया गया और पैसे दे दिये गये. इसके बाद त्रिवेंद्र सिंह रावत के कहने पर अमृतेश चौहान ने रांची में समाचार प्लस के सीइओ उमेश कुमार के खिलाफ फर्जी राजद्रोह का मुकदमा दर्ज करा दिया. इसके बाद पत्रकार के खिलाफ साजिश रचकर सीएम आवास आने जाने लगा और फिर उत्तराखंड के मुख्यमंत्री का ही टूल बनकर आगे आकर काम करने लगा. इस बीच मामले को लेकर पत्रकारों द्वारा उत्तराखंड के नैनीताल हाईकोर्ट में याचिका दायर की गयी, जिसमें हाईकोर्ट ने सीबीआइ जांच करने का आदेश दे दिया और मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत पर एफआइआर दायर करने का आदेश दिया. (नीचे पढ़े पूरी खबरें)
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में क्या कहा है
उत्तराखंड के मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और उत्तराखंड सरकार की याचिका पर गुरुवार को सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई. इस सुनवाई के दौरान दो पत्रकारों के आरोप के मामले को चुनौती दी गयी थी. न्यायामूर्ति अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पीठ ने मामले की सुनवाई की और कहा कि मुख्यमंत्री को सुने बिना ही हाईकोर्ट द्वारा इस तरह का सख्त आदेश कि सीबीआइ की जांच कराना भौंचक्का करने वाला है क्योंकि खुद याचिकाकर्ता पत्रकारों ने प्राथमिकी दर्ज करने का अनुरोध भी नहीं किया था. श्री रावत की ओर से अटॉर्नी जेनरल के वेणुगोपाल ने कहा कि मुख्यमंत्री को सुने बगैर ही एफआइआर दर्ज नहीं की जा सकती है और इस तरह के आदेश चुनी गयी सरकार को अस्थिर कर सकता है. आपको बता दें कि उत्तराखंड के नैनीताल हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत के खिलाफ आरोपों की जो प्रकृति है, उससे लगता है कि सच को सामने लाना जरूरी है. यह राज्य हित में होगा ताकि जनता के सामने सच आ सके. हाईकोर्ट ने यह फैसला पत्रकार उमेश शर्मा और शिव प्रसाद सेमवार की दो अलग-अलग याचिका के आधार पर सुनवाई करते हुए दी थी. पत्रकारों ने जुलाई 2020 में अपने खिलाफ किये गये केस को चुनौती दी गयी थी. एफआइआर को क्वैश करने की याचिका दायर की गयी थी. आपको बता दे कि रिटायर प्रोफेशर हरेंद्र सिंह रावत ने देहरादून के राजपुर थाना में पत्रकार उमेश शर्मा के खिलाफ ब्लैकमेलिंग, दस्तावेजों की कूट रचना और गलत तरीके से बैंक खातों की जानकारी हासिल करने का आरोप लगाते हुए पत्रकारों के खिलाफ एफआइआर दायर किया था. इस मामले में एक वीडियो भी सामने आया था, जो त्रिवेंद्र सिंह रावत की बहन सविता रावत की थी, जो पैसों का लेनदेन कर रही थी.






